अंश

किसी वस्तु/पदार्थ के बड़े भाग में से छोटा भाग को बड़े भाग का अंश कहते है।

 

श्रीमद् भगवद् गीता में अंश सम्बंधित वर्णन।

 

अध्याय १५ श्लोक ७ में “ममैवांशो” पद आया है। जिसका संधि विछेद  इस प्रकार है।

मम  –  मेरा;

एव  –  ही ;

अंश:  –  अंश

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि प्राणी को चेतना मेरे तत्व से ही प्राप्त होती है, जिसको चेतन तत्त्व कहते है। मनुष्य को इस चेतना के कारण ही स्वयं के होने का आभास होता है।

इस श्लोक में ‘मेरे‘ पद से अव्यक्त परमात्मतत्व को लेना चाहिये, न की मनुष्य शरीर में भगवान श्रीकृष्ण।

जिस प्रकार परमात्मतत्व सनातन है, उसी प्रकार चेतन तत्त्व, भी सनातन है।

‘अंश’ पद से ऐसा भाव उत्त्पन्न होता है की छोटा भाग अपने बड़े भाग से पृथक (अलग) है। परन्तु यहाँ चेतन तत्त्व और परमात्मतत्व एक ही है। परमात्मतत्व सम्पूर्ण सृष्टि में और प्राणी में सामान रूप से व्याप्त है। क्योकि चेतना का प्रकाशक परमात्मतत्व है, इसलिये उस चेतना के प्रकाशक को चेतन तत्त्व भी कहते है।

परमात्मतत्व से चेतना प्राप्त होने के कारण ही मनुष्य को जीव एवं जीवित कहा जाता है। इस चेतना के कारण ही मनुष्य को इन्द्रियों द्वारा संसार का अनुभव होता है। क्योकि संसार का अनुभव बुद्धि को होता है, इसलिये बुद्धि उस अनुभव को स्वयं का मान लेती है। वह यह जान नहीं पाती की अनुभव चेतना होने के कारण है, जो परमात्मतत्व से प्राप्त है।

 

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