प्राय असमर्थ एक भाव है जो प्रथम बार कार्य को करते समय उत्त्पन्न होता है। प्रयत्न करने पर भी अगर कार्य नहीं होता है तो असमर्थ का भाव पुष्ट होता है, अन्यथा यह भाव जाता रहता है।
श्रीमद् भगवद् गीता में योग साधना की सिद्धि के लिये अनेक पड़ाव है, जिसमें से कुछ को करना सरल है और कुछ को करना कठिन।
अध्याय १२ में भगवान श्रीकृष्ण कठिनता से सरल प्रकार की साधना का वर्णन करते है।
अध्याय १२ श्लोक ८ में भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि हे अर्जुन तुम अपने मन और बुद्धि को परमात्मा में स्थिर करो। परमात्मतत्त्व का ज्ञान होने पर, विवेक जागृत होने पर मन और बुद्धि परमात्मा में तुरंत ही स्थिर हो जाती है।
मन और बुद्धि को परमात्मा में स्थिर होने का अर्थ इस प्रकार है।
अध्याय १२ श्लोक ९ में भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि हे अर्जुन अगर तुम अपने मन और बुद्धि को परमात्मा में स्थिर करने में अपने को असमर्थ अनुभव करते हो तो तुम योग साधना का अभ्यास करो। कारण कि अभ्यास करने से कठिन से कठिन कार्य सिद्ध होते है।
अध्याय १२ श्लोक १० में भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि अगर तुम परमात्मतत्त्व के ज्ञान को ग्रहण (अनुभव) करने मे अपने को असमर्थ पाते हो और अभ्यास करने से सिद्धि में विलंब देखते हो, तो तुम सब प्रकार के विचार छोड़ दो। और जो कार्य मैं जिस प्रकार कहता हूँ उसी प्रकार करो। ऐसा करने से भी तुम योग सिद्धि को प्राप्त हो जाओगें।
भगवान श्रीकृष्ण जिन कार्यों को जिस प्रकार करने के लिये कहते है, वह सभी धर्म परायण है (कर्तव्य है) और योग साधना स्वरूप है।
अध्याय १२ श्लोक ११ में भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि हे अर्जुन अगर तुम समता में स्थित होकर कर्तव्यों को करने में भी अपने को असमर्थ अनुभव करते हो, तो, तुम कर्म का फल क्या होगा, इसका विचार छोड़ दो। अर्थात कर्म फल में आसक्ति का त्याग करो। ऐसा करने से तुमको शान्ति की अनुभूति होगी।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
Read More