कार्य को आरम्भ करने से पूर्व मनुष्य कठिन भाव को अनुभव करता है।
कार्य को करने में जो यथा शक्ति, कोशल, ज्ञान, जितना समय चाहिए, वह सब होने पर मनुष्य को वह कार्य करने में सरलता या सुगमता लगती है। अन्यथा वह कार्य कठिन लगता है। जो कार्य आरम्भ में कठिन लगता है, करने से बाद वह कार्य ही सुगम हो जाता है।
मनुष्य के मन में जब तक संसार के विषयों का चिन्तन रहता है, तब तक उसके मन में संसार के विषयों को प्राप्त करने की कामना बनी रहती है। अतः भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि मनुष्य को ध्यान योग के द्वारा परमात्मा का चिन्तन करने का अभ्यास करना चाहिये। इसी विषय को लेकर अध्याय ६ श्लोक ३४ में अर्जुन मन को सयंमित करने को वायु के समान अत्यन्त कठिन मानते है। इस श्लोक में कठिन शब्द के लिये ‘दुष्कर‘ पद आया है।
इसके उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण अध्याय ६ श्लोक ३५ में कहते है कि अभ्यास और वैराग्य के द्वारा मन को सयंमित किया जा सकता है।
संक्षिप्त में भक्ति क्या है?
जो मनुष्य शरीर, मन, बुद्धि में ममता, अहंता और आसक्ति का त्याग करके, केवल परमात्मा की महत्ता रखता हैं, वह परमात्मा का अनन्य भक्त हैं। अनन्य भक्त संसार के विषयों का चिन्तन नहीं करता। वह केवल परमात्मा का ही चिन्तन करता है।
जो साधक परमात्मा की भक्ति करता है, उसके सभी कार्य परमात्मा के लिये होते है। परमात्मा के लिये कार्य करने का अर्थ है कि साधक के सभी कार्य समाज कल्याण के लिये होते है, स्वयं के लिये नहीं। परमात्मा के लिये कार्य करना ही योग है।
अध्याय १२ श्लोक १ में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से प्रश्न करते है कि परमात्मा के किस रूप की भक्ति करने से साधक योग में निपूर्ण होता है।
अध्याय १२ श्लोक ५ में भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि साधारण मनुष्य के लिये अव्यक्त की भक्ति करने में कष्ट अधिक होता है। कारण की, साधारण मनुष्य इन्द्रियों के विषय में आसक्त रहता है। उसके लिये अव्यक्त तत्व को बुद्धि के विचारों में लाना, उसका अनुभव करना, उसका चिन्तन करना कठिन होता है।
श्रीमद् भगवद् गीता में कठिन शब्द अध्याय १२ श्लोक ५ में र्दुःखं पद से आया है।
अतः मनुष्य के लिये परमात्मा की सकार रूप में भक्ति करना सरल है। परन्तु जो परमात्मतत्व है वह अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्त ही है (अध्याय १२ श्लोक ३)।
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