अर्पण

जिस पदार्थ/विषय पर मनुष्य अपना स्वामित्व मानता है, उस पदार्थ/विषय का स्वामित्व किसी अन्य को दे देना, अर्पण करना है।

 

सनातन धर्म का पालन करने वाले अर्पण पद का प्रयोग परमात्मा को लेकर करते है।

मनुष्य को प्रकृति से जो कुछ भी प्राप्त है, उसके प्राप्त होने में परमात्मा कारण है। मनुष्य को स्वयं का शरीर भी प्रकृति से प्राप्त है और उसके प्राप्त होने में परमात्मा कारण है। परन्तु मनुष्य मूढ़ता वश, प्रकृति से प्राप्त शरीर, पदार्थ, परिस्थिति पर अपना स्वामित्व मान लेता है, जो की उसका नहीं है।

स्वामित्व मानने के कारण जब उस पदार्थ, परिस्थिति से वियोग होता है, तब मनुष्य को दुःख होता है।

समाजिक संसार में जितनी भी विषमताये है उसका कारण मनुष्य द्वारा स्वयं को संसार और संसार के विषयों का स्वामी मानना है।

श्रीमद् भगवद् गीता में अर्पण सम्बंधित वर्णन।

अध्याय ३ श्लोक ३०

भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि हे अर्जुन! तुम कर्ता भाव से सन्यास (त्याग करो) लो। और समस्त कार्यों को परमात्मा के अर्पण कर दो। अर्थात समस्त कार्य परमात्मा की कृपा, आशीर्वाद और प्रेणना से हो रहे है, ऐसा दृढ़ता से मानो।

अर्जुन स्वयं के शरीर पर अपना स्वामित्व मानता है और शरीर के द्वारा होने वाले कार्यों को स्वयं के कार्य मानता है। अतः भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि तुम कर्ता भाव का त्याग करो और शरीर का स्वामी परमात्मा को मानो।

अध्याय ५ श्लोक १०

भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि जो योगी समस्त कार्यों से अपने सम्बन्ध का त्याग करता है और उन कार्यों का स्वामित्व परमात्मा को मानता है, वह पाप से लिप्त नहीं होता।

यहाँ विशेष ध्यान देने वाला विषय यह है कि, समस्त कार्य समाज कल्याण के लिये कर्तव्य रूपी होने चाहिये। मनुष्य जब अपनी कामना पूर्ति और भोग के लिये कार्य करता है, तब उन कार्यों का अर्पण नहीं बनता। और वह कार्य अर्पण हो भी नहीं सकते, क्योंकि उनसे सम्बन्ध तो बना हुआ ही है।

मनुष्य जब अपनी कामना पूर्ति के लिये कार्य करता है और यह कहता है कि वह कार्य परमात्मा के द्वारा हुए है, तब वह धूर्त है।

अध्याय ८ श्लोक ७

अर्पण करना केवल कहने का विषय नहीं है। अपितु यह मन और बुद्धि द्वारा मानने का विषय है। शरीर पर अपना स्वामित्व मानना मन-बुद्धि का विकार है।

भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि अर्जुन तुम मन-बुद्धि को भी परमात्मा के अर्पण करो। मन-बुद्धि को परमात्मा के अर्पण करने का अर्थ है की निरन्तर विचार करो की सभी पदार्थ, प्राणी, का कारण परमात्मा है। मेरे शरीर और शरीर से होने वाली क्रिया का कारण भी परमात्मा है।

अतः अर्पण करना निरन्तर अभ्यास का विषय है और निरन्तर अभ्यास करने से मन-बुद्धि पर परमात्मा का स्वामित्व स्थित हो जाता है।

अध्याय १८ श्लोक ५७

कार्य परमात्मा को अर्पण करना मन-बुद्धि का कार्य है। यह विषय भगवान श्रीकृष्ण पुनः इस श्लोक में कहते है।

मेरे युद्ध करने से मेरे सम्बन्धी मारे जायेगे, अर्जुन को ऐसा विचार था। इस विचार में “मेरे” पद से को अपने शरीर पर स्वामित्व का भाव था।  वह स्वयं को कर्त्ता मानता है। इस मूढ़ता को समाप्त करने के लिये ही भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि तुम अपने चित में सभी कार्यों को परमात्मा के अर्पण करो। अर्थात परमात्मा को स्वामित्व मानो, कारण मानो।

अध्याय ९ श्लोक २७

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण विस्तार से उन सभी क्रियाओं का वर्ण करते है जो करने चाहिये और जिनको विचार करके परमात्मा के अर्पण करना है।

यदश्नासि पद से वह सभी क्रियाएँ आ जाती है जो शरीर के पोषण, स्वस्थ और सुरक्षा के लिये अनिवार्य है। अतः मनुष्य जो भी ग्रहण करता है, बौलता है, सुनता है, देखता है, आदि वह सभी कार्य भागवत कृपा से हो रहे है। इन सब कार्यों में चेतना रूपी “मैं” का कोई योगदान नहीं है। मनुष्य को बुद्धि भी परमत्मा से प्राप्त है।

यज्जुहोषि पद से वह सभी क्रियाएँ आ जाती है, जो मनुष्य जीवन निर्वाह के लिए साधन जुटाने के लिये संसार में करता है। अर्थात् वो कार्य जिनके द्वारा मनुष्य संसार में कुछ उत्पति करता है। उत्पति द्वारा संसार से प्राप्त पदार्थ का प्रयोग वह स्वयं के लिये और संसार के अन्य प्राणीओं के लिये करता है।

ददासि यत् पद से वह सभी क्रियाएँ आ जाती है, जो मनुष्य दूसरों की सेवा हेतु करता है।

यत्तपस्यसि पद से तप सम्बन्धी सभी क्रियाएँ आ जाती है, जो मनुष्य स्वयं और संसार के कल्याण के लिये करता है। इन्द्रियों को संयमित रखना, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में सम भाव रहना, परमात्मा का चिन्तन करना, आदि।

भगवान श्रीकृष्ण है कि इन सब प्रकार के कार्यों को तुम (अर्जुन) परमात्मा को अर्पण कर। अर्थात इन कार्यों का कारण परमात्मा को मान।

ध्यान रहे की यदश्नासि क्रिया में संसारिक विषयों (खाना, देखना, बोलना, सुनना आदि) में भोग नहीं होना चाहिये। यज्जुहोषि क्रिया में प्राप्त सामग्री का संग्रह नहीं होना चाहिये। यत्तपस्यसि कार्यों में ममता नहीं होनी चाहिये। ददासि यत् कार्यों में निश्चित रूप से अहंकार नहीं होना चाहिये।

अध्याय ९ श्लोक २८

भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि, सभी प्रकार के कार्यों (पूर्व श्लोक में वर्णित) को परमात्मा के अर्पण करने से तुम कर्मों से प्राप्त होने वाले शुभ-अशुभ कर्मफलों के बन्धन से मुक्त हो जाओंगे। अर्थात तुम्हे पाप-पुण्य नहीं लगेगा।

इस प्रकार कार्य को परमात्मा के अर्पण करने से मनुष्य संसार के बंधनों से मुक्त हो जाता है और उसको परम् आनन्द की प्राप्ति होती है।

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