अतः यज्ञ सिद्धान्त के रूप में संज्ञा भी है और कार्य के रूप में क्रिया भी है।
भौतिक विज्ञान में यज्ञ सिद्धान्त एक अत्यन्त महत्पूर्ण और मूल सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त का वर्णन भगवान श्रीकृष्ण श्रीमद् भगवद् गीता के अध्याय ३ श्लोक १० में करते है। आइये जानते है कि यह यज्ञ सिद्धान्त क्या है?
आकाशगंगा, नक्षत्र, सौरमंडल, भूमण्डल, सृष्टि के घटक है और इन सब को मिला कर सम्पूर्ण सृष्टि प्रतिष्ठित है।
यह सभी घटक कई प्रकार की क्रियाओं के पुंज है। घटक में यह क्रियाएँ, ‘क्रिया-प्रतिक्रिया’ के रूप में निरन्तर स्वतः ही होती रहती है। साथ ही इस क्रिया-प्रतिक्रिया में हर क्रिया का आरम्भ और अंत होता है।
प्रत्येक घटक अपनी क्रियाओं से अन्यों को प्रभावित करता है और अन्यों की क्रियाओं से स्वयं भी प्रभावित होता है। और इस प्रकार एक-दूसरे के प्रभाव में प्रत्येक घटक में क्रिया-प्रतिक्रिया का चक्र निरन्तर चलता रहता है।
यज्ञ सिद्धान्त यह कहता है कि सृष्टि के अस्तित्व का कारण, सृष्टि का गतिशील होना है। सृष्टि के गतिशील होने के दो कारण है:
यज्ञ सिद्धान्त के अनुसार, क्रिया-प्रतिक्रिया, आरम्भ-अंत की निरन्तर चलने वाली चक्र क्रिया यज्ञ है।
यह चक्र क्रिया रूपी यज्ञ सृष्टि में अनेक स्तर पर चलती है। उनमें से कुछ मुख्य इस प्रकार है।
अगर सौरमंडल पर दृष्टि करे तो, सूर्य सौरमंडल के मध्य में है और अन्य ग्रह सूर्य की परक्रिमा करते है। पृथ्वी भी सूर्य की परक्रिमा करती है और चन्द्रमा, पृथ्वी की परक्रिमा करता है। साथ ही प्रत्येक ग्रह अपनी धुरी पर भी चक्र लेता है।
यह सभी ग्रह अपनी क्रियाओं से अन्यों को प्रभावित करते हैं और अन्यों की क्रियाओं से स्वयं भी प्रभावित होते हैं।
पृथ्वी पर दिन-रात का होना, ऋतु का बदलना आदि, अनेक प्रभावित होने के उदाहरण है।
श्रीमद् भगवद् गीता में अत्यन्त ही स्पष्टता से सृष्टि के स्तर यज्ञ किस प्रकार कार्य करता है, उसका वर्णन इस प्रकार हुआ है।
अध्याय ३ श्लोक १० में ‘सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा’ वाक्य से कहा गया है कि सृष्टि की रचना के साथ, सृष्टि के घटक (प्रजाः) स्थापित हुए और स्थापित हुई यज्ञ क्रियाएँ।
यज्ञ क्रिया किस प्रकार कार्य करती है, उसका वर्णन अध्याय ३ श्लोक ११ में इस प्रकार हुआ है।
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ।
अर्थात सभी देवता (घटक) एक दूसरे को प्रभावित (उन्नत) करते है और स्वयं भी प्रभावित (उन्नत) होते है। और इस प्रकार एक दूसरे को प्रभावित करते परम कल्याण को प्राप्त होते है।
इस श्लोक में ‘देवा’ पद सृष्टि के सभी घटकों के लिये आया है।
‘भावयत-भावयन्तु’ पद का अर्थ, क्रिया-प्रतिक्रिया के रूप में प्रभावित होना और करना है।
‘परस्परं भावयन्तः’ से स्पष्ट होता है कि एक दूसरे को प्रभावित करने की प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है।
‘परमवाप्स्यथ’ पद का अर्थ है कि सभी घटक का अस्तित्व बना रहेगा।
इन दोनों श्लोको से स्पष्ट होता है कि, ‘क्रिया-प्रतिक्रिया’ का निरन्तर चलने वाला जो चक्र है, वह यज्ञ है।
सौरमंडल के समान, भूलोक में स्थित पशु, पक्षी, एवं अन्य प्राणी की उत्त्पति-स्थिति-नाश, का चक्र (जीवन-चक्र) निरन्तर चलता रहता है। प्राणी जब अस्तित्व में है तब उसके शरीर में भी अनेक प्रकार की क्रिया होती रहती है और उन क्रियाओं का भी आरम्भ और अंत होता रहता है।
भूलोक के प्राणी अपने स्थिति (जीवन) काल में अन्य प्राणियों को अपना आहार बनाते है और स्वयं भी अन्यों के लिये आहार बनते है। (खाद्य श्रृंखला; भोजन चक्र)
भूमंडल स्तर पर होने वाले यज्ञ क्रिया का वर्णन अध्याय ३ श्लोक १४ इस प्रकार हुआ है।
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः
‘अन्नाद्भवन्ति भूतानि:’ सम्पूर्ण प्राणी का पोषण अन्न से होता है। (“अन्न” पद का प्रयोग सभी प्रकार की वनस्पति के लिये हुआ है।)
‘पर्जन्यादन्नसम्भवः’ अन्न की उत्त्पति वर्षा से होती है।
‘यज्ञाद्भवति पर्जन्यो’ वर्षा के होने में यज्ञ (जलचक्र) कारण है।
पुनः इस श्लोक से स्पष्ट होता है की जलचक्र को यज्ञ कहा है। साथ ही इस श्लोक में जीवन चक्र, इकोलॉजिकल साइकिल (पारिस्थितिक चक्र) आदि सभी चक्र समाहित है।
भूमंडल के स्तर पर होने वाले यज्ञ और सौरमंडल के स्तर पर होने वाले यज्ञ ही पृथ्वी पर जीवन होने में कारण है, इसकी पुष्टि अध्याय ३ श्लोक १२ से होती है।
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।
अर्थात, इस प्रकार यज्ञ से स्थित हुए और अपना कार्य करते हुए सभी घटक, जीवन-निर्वाह सम्बंधित सभी सामग्री स्वतः ही देते रहेगे।
इस श्लोक में ‘यज्ञभाविताः’ पद का अर्थ है यज्ञ से प्रभावित होना, स्थित होना, कार्य करना।
सौरमंडल और भूमंडल के स्तर पर होने वाले यज्ञ ही मनुष्य को कार्य करने के लिये बाध्य भी करते है और उसके कार्य प्रभावित भी होते है। दिन-रात का होना, ऋतु का बदलना आदि अनेक विषय है जिससे मनुष्य के लिये अनेक प्रकार के कार्य उत्पन्न होते है।
इस विषय की पुष्टि अध्याय ३ श्लोक १४ के ‘यज्ञः कर्मसमुद्भवः’ वाक्य से होती है। अर्थात यज्ञ से ही मनुष्य के कार्य संभव और सम्पन होते है।
मनुष्य और अन्य प्राणी जीवन निर्वाह और जीवन चक्र को चलाने के लिए जो भी कार्य करते है, उसके लिये ‘कर्म‘ पद आया है।
उसी प्रकार अध्याय ३ श्लोक १० में वर्णन हुआ है:
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्।
अर्थात मनुष्य यज्ञ में अपने कार्यों (कर्तव्यों) द्वारा अपने को समृद्ध करे और यज्ञ से ही जीवन-निर्वाह के लिये उपयुक्त सामग्री प्राप्त होती रहेंगी।
अतः मनुष्य संसार में रहकर अनेक प्रकार के कार्य करता है और उन कार्यों के भी आरम्भ-अन्त होते है। मनुष्य के कार्य अन्य व्यक्तियों को प्रभावित करते है और अन्यों के कार्य से मनुष्य स्वयं प्रभावित होता है।
सामाजिक व्यवस्था में सामूहिक रूप से अनेक प्रकार के कार्य होते है, जिसमें सभी अपना योगदान देते है। इस व्यवस्था में भी अनेक प्रकार के चक्र चलते है।
अध्याय ४ श्लोक २४ से अध्याय ४ श्लोक ३० में मनुष्य द्वारा किये जानेवाले अनेक प्रकार के यज्ञों का वर्णन है।
सौरमंडल, और भूमण्डल मनुष्य को प्रभावित करते है और मनुष्य के कार्य भूमण्डल को प्रभावित करते है।
इस प्रकार मनुष्य द्वारा किये जानेवाले सभी कार्य यज्ञ है।
यज्ञ सिद्धान्त से स्पष्ट है कि सृष्टि के घटक, जिनको देवता नाम से सम्बोधित किया जाता है, वे मनुष्य पर और मनुष्य के कार्य पर अपना प्रभाव डालते है।
अतः यज्ञ सिद्धान्त का अनुसरण करते हुए, मनुष्य जब कोई शुभ कार्य करता है, तब उस कार्यों को करने से पूर्व वह अग्निहोम यज्ञ करता है। ऐसा करने से घटकों के द्वारा पड़ने वाला प्रभाव मनुष्य पर और मनुष्य के कार्य के अनुकूल बनाते है।
इस यज्ञ में मंत्रों के उच्चारण से ध्वनि की तरंग उत्पन्न होती है। हवनकुंड की अग्निं में डाले जानेवाली सामग्री से, आकाश में एक विशेष प्रकार का वातावरण उत्पन्न होता है। ऐसा होने से ग्रह आदि अन्य घटक से पड़ने वाले प्रभाव मनुष्य के कार्य को कार्य सिद्धि के अनुकूल बनाते है।
अनेक प्रकार के चक्र ही यज्ञ है इसकी और अधिक स्पष्टता अध्याय ३ श्लोक १६ श्लोक से होती है। इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण में कहते है कि:
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः “जो मनुष्य इस प्रकार प्रवर्तित हुए सृष्टि चक्र का अनुवर्तन नहीं करता “।
जिस यज्ञ पद से सम्बंधित विषय का वर्णन पूर्व के श्लोकों में हुआ है, उसको इस श्लोक में ‘चक्रं‘ पद से सम्बोधित किया है।
अतः सृष्टि की चक्र रूप में गतिशील रहने की जो प्रक्रिया है, उस प्रक्रिया को ‘यज्ञ’ कहते है और इसका सिद्धान्त ही यज्ञ सिद्धान्त है।
प्रत्येक घटक में और घटक से होने वाली क्रिया इस यज्ञ में क्रिया रूप आहुति है।
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