इसका अर्थ है “बिना किसी फल की इच्छा के कर्म करना” ( बिना किसी फल की इच्छा के कर्म करना ।)। भगवद गीता कर्म करने के महत्व को बताती है, लेकिन यह इस बात पर भी जोर देती है कि कर्मों को बिना किसी स्वार्थ के करना चाहिए। फल की इच्छा से किया गया कर्म व्यक्ति को मोह में डाल सकता है। अकर्माणि का अभ्यास करने से व्यक्ति को शांति और संतुष्टि मिलती है।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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