अनिष्ट की आशंका से उत्पन्न होने वाले भाव का नाम भय है और उस भय का सर्वथा अभाव होना ‘अभय’ है।
संसारिक विषयों से अपना सम्बन्ध मानना, उनमे आसक्ति का होना भय का कारण है। जिस विषय से सम्बन्ध होता है, उस विषय का वियोग होने पर दुःख होता है। अतः विषय के वियोग से होने वाले दुःख ही आशंका भय का भाव उत्तपन्न करती है।
मनुष्य सबसे अधिक सम्बन्ध अपने शरीर से मानता है। शरीर से सम्बन्ध होने से और स्वयं की सत्ता शरीर में देखने से, मनुष्य को शरीर के न रहने का अत्यधिक भय होता है। अतः मनुष्य को मृत्यु से भय होता है।
मनुष्य जब संसारिक विषयों से माने हुये सम्बन्ध का त्याग कर देता है, तब उस विषय का वियोग होने पर उसको दुःख नहीं होता। और वियोग की आशंका से भय का भाव उत्तपन्न नहीं होता। भय का भाव न होना ही अभय है।
जो मनुष्य योग सिद्धि के लिये साधना करता है, वह आसक्ति एवं सम्बन्ध से रहित हो जाता है। ऐसे व्यक्ति का संसारिक पदार्थ और प्राणी से तो सम्बन्ध रहता ही नहीं, साथ ही स्वयं के शरीर के प्रति ममता, आसक्ति नहीं रहती। अतः वह अभय हो जाता है।
अध्याय १० श्लोक ४ में भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि अभय, मनुष्य के बीस भाव में से एक भाव है।
अध्याय १६ श्लोक १ में भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि, जो मनुष्य अभय है वह देवी सम्पदा को प्राप्त है।
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