अहंता शब्द मनुष्य के सन्दर्भ में आता है। मनुष्य जिस कार्य का कर्त्ता नहीं है, स्वयं को उस कार्य का कर्त्ता मानना अहंता है।
मनुष्य कौन है?
मनुष्य की बुद्धि को “मैं हूँ” (स्वयं के होने) का जो अनुभव, ज्ञान होता है, वह मनुष्य की चेतना है। चेतना, चेतन तत्व से प्राप्त होती है, परन्तु इस चेतना (“मैं हूँ”) का ज्ञान (अनुभव) बुद्धि को होता है। यह चेतना ही मनुष्य (शरीर,मन और बुद्धि) को एक इकाई के रूप में संसार से अलग करती है।
मनुष्य संसार का अनुभव अपनी इन्द्रियों द्वारा करता है। मनुष्य को प्रकृति पदार्थ एवम प्रकृति में हो रही क्रिया का जो ज्ञान होता है, वह इन्द्रिय रूपी यन्त्र से ही होता है।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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