आर्त

आर्त – वह मनुष्य जो पीड़ित, विषम संकट, परिस्थिति में हो।

 

अध्याय ७ श्लोक १६ में भगवान श्रीकृष्ण ने चार प्रकार के भक्तों का वर्णन किया है। उनमें से एक प्रकार का भक्त ‘आर्त’ है।

 

चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन।

आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ।

 

आर्त भक्त, वह भक्त है जो संकट में पड़ने पर परमात्मा को पुकारता है।

अहंकारी मनुष्य सभी कार्यों का कर्त्ता स्वयं को मानता है। परन्तु जब वह किसी विषम संकट में घिर जाता है। जब उसके कोई शारीरिक बीमारी घेर लेती है, किसी प्रकार की वेदना होती है, प्रतिकूल परिस्थिति उत्तपन्न होती है, या प्राण-संकट में होते है। तब उसको परमात्मा की याद आती है। तब उसको विचार होता है की कोई उससे भी बड़ी शक्ति है जो उसको संकट से बहार निकाल सकती है।

तब वह परमात्मा को पुकारता है, उनका कीर्तन करता है। कीर्तन अर्थात गुण गान करता है। तब उसको विचार होता है की इस विषम परिस्थिति में वह स्वयं कुछ नहीं कर सकता। जो करेगा वह परमात्मा करगें। उस परिस्थिति में मनुष्य की की बुद्धि में जो अहंता (अहंकार) का भाव है वह जाता रहता है।

अध्याय ७ श्लोक १८ में ऐसे भक्तों को भगवान श्रीकृष्ण उदार भाव वाला कहते है।

 

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