एक + तत्व = एकत्व
जिस मनुष्य (साधक) का भाव एकत्व का होता वह संसार में जितने भी प्राणी है, उनमें केवल परमात्मतत्व को अनुभव करता है (अध्याय ६ श्लोक ३०)।
परमात्मतत्व को अनुभव करने का अर्थ है की मनुष्य स्वयं को और अन्य प्राणियों को शरीर की सीमाओं से अलग अनुभव नहीं करता। अर्थात उसमें स्वयं के शरीर के प्रति ममता, अहंता नहीं होती। अन्यों के प्रति राग-द्वेष का भाव नहीं होता। साधक स्वयं और सभी में केवल परमात्मतत्व समान रूप से व्याप्त है, ऐसा विचार करता है और अनुभव करता है।
अध्याय ६ श्लोक ३१ में भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि जिस साधक में एकत्व भाव होता है, वह सभी प्राणियों के कल्याण के लिये कार्य करता है। वह अनुभव करता है कि सभी कार्यों कारण परमात्मतत्व है। शरीर द्वारा होने वाले कार्यों का कारण उसकी बुद्धि (अहंता) नहीं है।
जब साधक एकत्व भाव से सांसारिक कार्यों को करता है, तब साधारण मनुष्य तो उन कार्यों को अलग-अलग भाव से देखता है। अर्थात उन कार्यों को अच्छा-बुरा, पाप-पुण्य भाव से देखता है। परन्तु साधक के अन्तःकरण में केवल समता का भाव होता है, परमात्मतत्व भाव होता है। उसको विवेक होता है कि सभी कार्यों का कारण परमात्मतत्व है।
क्योकि उसके सभी कार्य समाज कल्याण के लिये होते है, स्वयं के लिये नहीं और उन कार्यों में कोई आसक्ति नहीं होती, इसलिये उसमें कार्य करते हुये समता का भाव रहता है। ममता, अहंता रहित, समता भाव से अन्यों के लिये कार्य करने से पाप-पुण्य नष्ट हो जाते है।
अध्याय ६ श्लोक ३१ में भगवान श्रीकृष्ण ऐसे साधक को “मयि वर्तते” कहते है। अर्थात ऐसा साधक मुझमें स्थित रहता है। मुझमें स्थित- अर्थात समता में स्थित रहता है।
अध्याय ६ श्लोक ४७ में भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि वह योगी जो एकत्व भाव से संसार के कल्याण हेतु अपने कर्तव्य करता है और कार्यों में अहंता नहीं रखता, वह सर्वश्रेष्ठ योगी है।
मनुष्य में एकत्व भाव तब उत्त्पन्न होता है जब:
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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