गुण

मनुष्य की मन और बुद्धि तीन गुणों के प्रभाव में कार्य करती है, जिनको गुण कहते है।

 

भारतीय ऋषियों (वैज्ञानिकों) ने सृष्टि के प्रत्येक घटक के गुण का अध्यन किया। घटक के गुणों से घटक की कार्य शैली का ज्ञान प्राप्त किया। अन्य घटकों के समान मनुष्य के गुणों का भी अध्यन किया।

घटक के गुण और उसकी कार्य शैली मनुष्य को किस प्रकार प्रभावित करते है और किस प्रकार इस प्रभाव को मनुष्य के अनुकूल किया जा सकता है, इसका भी अध्यन किया।

इन सब अध्यन से प्रकाशित हुआ गुण सिद्धान्त।

गुण सिंद्धान्त

आकाशगंगा, सौरमंडल, नक्षत्र, भूमण्डल, को मिला कर सृष्टि प्रतिष्ठित है। भूमण्डल मे भी वायु, अग्नि, जल, आकाश, पृथ्वी, जड़-चेतन प्राणी एवं अन्य अनेक प्रकार के प्रदार्थ है।

अगर सृष्टि एक इकाई है तो इस सृष्टि में जो भी प्रतिष्ठित है, वह इस इकाई के घटक है।

सृष्टि के प्रत्येक घटक में होने वाली क्रिया (क्रिया-प्रतिक्रिया; उत्त्पति-उपस्थिति-विनाश) एक निश्चित रूप में होती है। घटक में होने वाली क्रियाओं का आधार, घटक को प्राप्त उसके गुण है। घटक के गुण, घटक में और घटक से होने वाली क्रिया-कार्य को नियमित करते है।

अतः सृष्टि के घटक में निश्चित रूप से होने वाली क्रिया/कार्य को उस घटक का गुण अथवा प्रकृति कहते है।

घटक के गुणों के कारण, घटक जो कार्य करता है, वह उस घटक का गुण-धर्म (करने योग्य कार्य) कहलाता है।

जल का धर्म बहना है, अग्नि का धर्म जलाना है, वृक्ष का धर्म फल-फूल देना है, आदि।

मनुष्य भी अपने गुणों के अनुरूप कार्य करता है, जो उसके गुण-धर्म कहलाता है।

मनुष्य के गुण

वैसे तो मनुष्य में अनेक प्रकार के गुण है। परन्तु मूल रूप से मनुष्य में दो श्रेणी के गुण विध्यमान है।

प्रथम श्रेणी

मनुष्य के यह तीन मुख्य गुण, मनुष्य को सृष्टि के अन्य जीव-जन्तु (प्राणी) से अलग करते है।

  1. बुद्धि-विवेक
  2. कार्य करने की कुशलता (हस्तकला)
  3. बल-निर्भीकता

कार्य कुशलता और बुद्धि के कारण मनुष्य कुछ भी करने, रचने में सक्षम है।

परन्तु मनुष्य के यह गुण, सभी मनुष्य को समान रूप से प्राप्त नहीं है। सभी मनुष्यों में यह गुण तो होते है, परन्तु इनकी मात्रा अलग-अलग होती है। किसी में किसी गुण की अधिकता होती है और किसी में किसी गुण की।

और यह ही कारण है की मनुष्य समाज में रहने के लिये बाध्य है।

इस प्रकार अलग-अलग मात्रा में प्राप्त होने वाले यह गुण के मूल में जो सिद्धान्त है, उसको वर्ण गुण सिद्धान्त कहते है।

मनुष्य समाज में किस प्रकार से कार्य करे, यह वर्ण गुण सिद्धान्त से प्रभावित होते हैं।

द्वितीय  श्रेणी

मनुष्य की बुद्धि जिन गुणों से प्रभावित होती है, उनको त्रिगुण के नाम से जाना जाता है। मनुष्य की बुद्धि प्रभावित के प्रभाव में ही कार्य करती है। या यू कहिये तो, इन्हीं गुणों से संचालित होती है। परन्तु, चेतना से प्रकाशित होने के कारण और सभी विषयों की दृष्टा होने के कारण बुद्धि स्वयं को करता मानती है।

त्रिगुण में तीन प्रकार के गुण है जिनको सत्त्व, रज और तम के नाम से जाना है।

सत्त्व गुण

सत्त्व गुण के प्रभाव में मनुष्य की प्रज्ञ एवं विवेक रूपी शक्ति कार्य करती है। सत्त्व गुण के प्रभाव में मनुष्य चेतना, शरीर और संसार को पृथक-पृथक रूप में देखता है। संसार के विषयों को भी मनुष्य पृथक-पृथक रूप में देखता है। प्रत्येक विषय क्या है, क्यों है और कैसे है, इस का ज्ञान अर्जित करता है। किसी भी कार्य को करने से पूर्व प्राप्त ज्ञान के आधार पर उचित-अनुचित का विचार कर, कार्य करने का निर्णय लेता है।

तम गुण

तम गुण के प्रभाव में मनुष्य की प्रज्ञ एवं विवेक रूपी शक्ति शिथल रूप से कार्य करती है। मनुष्य चेतना, शरीर को पृथक रूप में देख ही नहीं पाता। संसार के विषयों से भी सम्बन्ध मानता है। किसी भी कार्य को करने से पूर्व बुद्धि, उचित-अनुचित का विचार नहीं कर पाती। बुद्धि पर मुड़ता छा जाती है। इससे मनुष्य में आलस्य,  प्रमाद आता है। कार्य करने में कष्ट को अनुभव करता है।

रज गुण

रज गुण के प्रभाव में मनुष्य की बुद्धि जड़ता से उपर उठ कर कार्य करने के लिये प्रेरित होती है। मनुष्य बुद्धि में चेतना प्रवाहित होती है जिसके कारण वह संसारिक कार्य करता है। रज गुण के कारण मनुष्य भौतिक विषयों के प्रति आकर्षित होती है। कार्य करने के लिये बल का अनुभव करना, कष्ट को अनुभव न करना, रज गुण के कार्य है।

परन्तु मनुष्य किस प्रकार के कार्य करता है, वह सत्त्व गुण, अथवा तम गुण की मात्रा से प्रभावित होते है।

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