तेजः

मनुष्य में एक विशेष प्रकार की दीप्ति, कांति, चमक, आभा, आकर्षण का होना तेजः है।

 

तेजः मनुष्य का गुण है और उस गुण के धनि व्यक्ति को तेजस् कहते है।

तेजस् व्यक्ति में अन्यों को अभिभूत करने की शक्ति होती है। तेजः के प्रभाव में अन्य मनुष्य तेजस् व्यक्ति का अनुसरण करने लग जाते है।

मनुष्य जब योग साधना करता है और उसके सभी कार्य अन्यों के कल्याण के लिये होते है, तब स्वतः ही उस मनुष्य में तेज: व्याप्त हो जाता है।

मनुष्य में तेज: का होना दैवी सम्पदा के लक्षण है (अध्याय १६ श्लोक ३)।

 

धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष

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