मनुष्य जब कोई भी क्रिया करता है और उस क्रिया के साथ अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है तो वह क्रिया कर्म कहलाती है |
सम्बन्ध जोड़ने का मतलब –
१. क्रिया का उद्श्य अपनी कामना पूर्ति,
२. क्रिया करने में राग-द्वेष
३. क्रिया की सिद्धि की कामना
४. क्रिया से फल प्राप्ति की इचछा
५. क्रिया करने में अहम – यह मेने किया है
मनुष्य अगर इन कारणों से प्राप्त क्रियाओ को नहीं करता तो भी वह कर्म ही है|
– दुःख समझकर एवं शारीरिक क्लेशके भयसे क्रिया न करना|
– मोह, आलस्य, प्रमादके कारण क्रिया न करना|
– क्रिया का त्याग करनेसे हमें मान, आदर मिलेगा|
– समाधिका सुख भोगनेके लिये क्रिया न करना है|
मनुष्य जो भी कर्म करता है उसका फल प्राप्त होना निश्चित है| जब कर्म किसी दूसरे के सुख, हित, के लिये, अथवा सेवा मे किया जाता है तो वह शुभ कर्म कहलाता है| वेदों मे ऐसा कहा गया कि शुभ कर्म का फल मनुष्य के लिये अनुकूल परिस्तिथि उत्पन करने वाला है, अतार्थ सुख देने वाला है| अतः वह पुण्य फल देने वाला है|
इसके विपरीत जब कर्म दुसरो के अहित, अपने स्वार्थ में किया गया हो तो वह विकर्म कहलाता है| विकर्म पाप फल देने वाला है, क्योकि उसके फल स्वरूप परतिकूल परिस्तिथि उत्पन होती है जो दुःख का कारण है।
समता मे स्थित हुआ मनुष्य जब कर्तव्य अकर्म (वह क्रिया जो दूसरों के हित के लिये, सेवा के लिये है हो, जिसमें किसी फल प्राप्ति की इचछा नहीं है और जिस में अहम भाव नहीं है) तो उसका फल पुण्य या पाप रूपी नहीं है| क्योकि उस कर्तव्य अकर्म मे फल प्राप्ति की इचछा ही नहीं है| फल अपने लिये नहीं तो फल फल का प्रभाव भी अपने लिये नहीं हैं।
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