बन्धन

आध्यात्मिक दृष्टि से अन्तःकरण की किसी वृत्ति के प्रभाव में कार्य को करना अथवा न करना बन्धन है।

 

शाब्दिक अर्थ में, किसी भी प्रकार की क्रिया के होने में हस्तक्षेप, व्यवधान, बाधा को बन्धन कहते है।

आध्यात्मिक दृष्टि से अन्तःकरण की किसी वृत्ति के प्रभाव में कार्य को करना अथवा न करना बन्धन है।

मनुष्य के अन्तःकरण में अनेक प्रकार की वृत्तियाँ स्थित है एवं उत्त्पन्न होती रहती है। कामना, राग-द्वेष, आसक्ति, ममता, अहंकार, भय, क्रोध, सुख-दुःख आदि कुछ मुख्य वृत्तियाँ है।

मनुष्य इन वृत्तियों के वश होकर कार्य को करता है अथवा नहीं करता है। इन वृत्तियों के कारण ही मनुष्य की कार्य करने की क्षमता बाधित हो जाती है। वृत्तियों के कारण ही जो कार्य धर्म पूर्ण होते है, उनको मनुष्य नहीं करता और जो कार्य अधर्म होते है, उनको करता है।

वृत्तियों के वश न होकर मनुष्य अगर इन वृत्तियों पर ही अंकुश लगाये तो मनुष्य के अन्तःकरण में समता स्थित हो जाती है। मनुष्य के अन्तःकरण में समता स्थित होने पर मनुष्य बन्धन मुक्त हो जाता है। बन्धन मुक्त होने पर मनुष्य के जीवन में अनन्त उज्वल संभावनाएं उत्त्पन्न हो जाती है।

श्रीमद् भगवद् गीता में बन्धन सम्बंधित वर्णन।

अध्याय २ श्लोक ३९

भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि अर्जुन समता में स्थित होने से तुम्हारे कर्म बन्धन से मुक्त हो जायगे। अर्थात तुम्हारे कर्म वृत्तियों से प्रभावित एवं बाधित नहीं होगे। अर्थात तुम्हारे जो कर्तव्य है, उनको तुम स्वतंत्र रूप से कर सकोगे।

 

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