शाश्वत

जिस तत्व की सत्ता में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं आता, वह शाश्वत है।

 

इस संसार में जितने भी प्राणी है, उनकी सत्ता कुछ समय के लिये दिखती है, और फिर लुप्त हो जाती है। जिस समय उनकी सत्ता दिखती है, उस समय भी उनमें निरन्तर परिवर्तन होता रहता है।

परन्तु सभी प्राणी का जो मूल तत्व है, वह परमात्मतत्व है। परमात्मतत्व की सत्ता न केवल सदैव विध्यमान रहती है, अपितु उसमें किसी प्रकार का परिवर्तन भी नहीं आता। उसका किसी प्रकार का क्षय भी नहीं होता।

जिस प्रकार परमात्मतत्व पूर्व में तहत, उसी प्रकार वर्तमान में है और भविष्य में रहने वाला है।

श्रीमद् भगवद् गीता में शाश्वत सम्बंधित वर्णन।

 

न जायते म्रियते वा कदाचि

न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।

अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो

न हन्यते हन्यमाने शरीरे।

 

भगवान श्रीकृष्ण शरीर और शरीरी में भेद बताने के लिये अध्याय २ श्लोक २० में शाश्वत पद का प्रयोग करते है।

भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि जन्म होने पर मनुष्य की सत्ता दिखती है। मनुष्य जन्म लेने पर शिशु के रूप में दीखता है। शिशु में वृद्धि होती है और उसकी अवस्थाय बदलती रहती है। कुछ समय उपरान्त उसमें वृद्धि होने की क्रिया में विराम लग जाता है। तदुपरान्त शरीर का क्षय होना आरम्भ हो जाता है।

इस के विपरीत परमात्मतत्व (शरीरी) में न तो किसी प्रकार की वृद्धि है और न किसी प्रकार का क्षय।

नित्य, निरन्तर शरीरी एक समान रहता है।

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