मनुष्य को जब किसी प्राप्त पदार्थ, प्राणी एवं परिस्थिति के प्रति स्पृहा, प्रियता का अनुभव होता है, तब वह अनुकूलता का भाव है।
अनुकूलता का विपरीत शब्द प्रतिकूलता है।
श्रीमद भागवत गीता में सर्व प्रथम अध्याय २ श्लोक १४ में भगवान श्री कृष्ण कहते है कि विषयों (पदार्थ, प्राणी एवं परिस्थिति) से होने वाले सुख-दुःख का कारण, उन विषयों में अनुकूलता-प्रतिकूलता करना है।
विषयों के प्रति अनुकूलता होती तो स्वतः है, परन्तु उस भाव को महत्त्व न देने पर उसका त्याग हो जाता है।
मनुष्य जीवन का एक मात्र उद्देश्य परमात्मा की प्राप्ति है, जो अन्तः करण में समता लाने से होती है। अनुकूलता-प्रतिकूलता का त्याग करने से ही समता की प्राप्ति होती है।
विषयों में अनुकूलता किस प्रकार होती है?
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
Read More