अध्याय २ श्लोक ३९ में भगवान श्री कृष्ण कहते है कि समता युक्त बुद्धि से कार्य करने से, जो कार्य से माना हुआ बन्धन रूपी सम्बन्ध है, उसका त्याग होता है। और अध्याय २ श्लोक ४० में कहते है कि समता युक्त बुद्धि से धर्म के कार्य करने से मृत्यु के भय का नाश होता है। अतः समता युक्त बुद्धि की विशेषता, गुण बताने के उपरान्त भगवान श्री कृष्ण इस श्लोक में कहते है कि इस समता को धारण करने के लिये तुम संसार की कामना का त्याग कर केवल समता प्राप्ति की कामना करो। अतः बुद्धि में एकमात्र निश्चय कर के, कामना के नाम पर केवल समता प्राप्ति की कामना हो।
आगे भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को सचेत करते है कि अगर तुम्हारी समता प्राप्ति के लिये एक निश्चित बुद्धि नहीं होगी तो, संसार प्राप्ति के लिये बुद्धि में अनके प्रकार की और अनन्त कामनायेँ उत्तपन्न होगी।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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