आकाशगंगा, नक्षत्र, सौरमंडल, भूमण्डल (भूमण्डल मे वायु, अग्नि, जल, व्रक्ष, पशु, पक्षी, और समस्त प्रदार्थ), सृष्टि के घटक है। इन सब को मिला कर सम्पूर्ण सृष्टि प्रतिष्ठित है।
सृष्टि यह सभी घटक, सृष्टि के कल्याण के लिये निरन्तर रूप से कार्य करते है। यहाँ सृष्टि का कल्याण, सृष्टि के गतिशील रहने में है।
मनुष्य के विषय में कहे, तो मनुष्य का अस्तित्व ही सृष्टि के गतिशील होने में है। मनुष्य को अपने जीवन-निर्वाह के लिये जो कुछ भी चाहिये, वह सब सृष्टि के अनेक घटकों से प्राप्त होता है। सुगमता से मनुष्य का जीवन-निर्वाह हो, इसमें ही मनुष्य का कल्याण है। अतः सृष्टि के सभी घटक, देवता है।
सनातन धर्म सिद्धान्त का अनुसरण करने वाली संस्कृति जब किसी को देवता पद से सम्बोधित करते है, तब वह कृतज्ञता: का भाव दर्शाता है। अतः देवता एक भाव है।
यही कारण है कि सनातन धर्म संस्कृति में सृष्टि के सभी घटक को देवी-देवता के भाव से देखा अथवा पूजा जाता है। पूजा कृतज्ञता: को दर्शाने की क्रिया है।
सूर्य देवता से तात्पर्य है कि सूर्य वह विषय है जिस के प्रति मनुष्य में कृतज्ञता: का भाव है। और यह ही कारण है कि ऐसे सभी विषयों के नाम से साथ देवता अथवा देवी पद निश्चित रूप से लगाया जाता है।
श्रीमद् भगवद् गीता में देवता सम्बंधित वर्णन।
अध्याय ३ श्लोक ११ में भगवान श्रीकृष्ण, सृष्टि के सभी घटको के लिये देवता पद का प्रयोग करते है। साथ में उनका गुण (बिना माँगे, जीवन-निर्वाह की सामग्री देना) क्या है, इसका वर्णन करते है।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
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