नियति

सृष्टि चक्र के गतिशील होने के कारण सृष्टि में निरन्तर नई-नई परिस्थिति उत्पन्न होती रहती है। मनुष्य को प्रभावित करने वाली इन परिस्थितियों को ही नियति कहते है।

 

नियति के अनुरूप मनुष्य के लिये कार्य उत्पन्न होते है। मनुष्य को प्रकृति से जो भी प्राप्त होता है, उसमें भी नियति ही कारण है।

सनातन धर्म सिद्धान्त ही नियति के निर्धारण का कारण

सृष्टि चक्र के क्रियाशील होने का जो कारण है, उसको यज्ञ सिद्धान्त कहते है। यज्ञ सिद्धान्त, सनातन धर्म सिद्धान्त श्रृंखला का एक अंग है।

यज्ञ सिद्धान्त के अनुसार सृष्टि के समस्त घटक अन्यों पर प्रभाव डालते हुए, क्रिया-प्रतिक्रिया के रूप में अपना-अपना कार्य करते है। क्रिया-प्रतिक्रिया के रूप में सृष्टि चक्र के गतिशील होने के कारण ही संसार में अनेक प्रकार की परिस्थितियाँ उत्पन्न होती है। उत्पन्न परिस्थितियों को ही नियति कहते है।

अतः सनातन धर्म सिद्धान्त ही नियति का कारण है।

मुख्य विषय यह है कि नियति की उत्पत्ति सृष्टि चक्र के गतिशील होने के कारण स्वतः ही हो रही है। किसी के द्वारा, विचार करके नियति निर्धारित नहीं हो रही है। अतः यह मनुष्य की अज्ञानता है, जो वह  नियति को निर्धारण हुआ मानता है।

श्रीमद् भगवद् गीता में नियति सम्बंधित वर्णन।

मनुष्य ऐसा मानता है कि, परमात्मा मनुष्य के पाप और शुभ कर्मों को ग्रहण कर नियति निर्धारित करते है। 

श्रीमद भागवत गीता के अध्याय ५ श्लोक १५ में भगवान श्रीकृष्ण अत्यन्त स्पष्टता से कहते है कि परमात्मा (अस्तित्व, सत्ता स्वरूप) न तो पाप कर्म और न शुभ कर्म को ग्रहण करते है। और अध्याय ५ श्लोक १४ में कहते है कि न ही परमात्मा किसी प्रकार के संयोग (नियति) की रचना करते है।

सृष्टि का स्वभाव (घटक के गुण और उनका कार्यशील होना) परिस्थितियों के उत्पन्न होने का कारण है। मनुष्य भी अपने स्वभाव (गुण) और प्राप्त परिस्थिति के अनुरूप कार्य करता है।

इस विषय का यह अर्थ नहीं है कि मनुष्य के पाप और शुभ कर्म का कोई प्रभाव नहीं होता। निश्चित ही होता है। परन्तु वह होता है सनातन धर्म सिद्धान्त के क्रिया-प्रतिक्रिया के अनुरूप।

नियति के अनुरूप मनुष्य के कार्य

मनुष्य को जो गुण प्राप्त होते है, उसमें सनातन धर्म सिद्धान्त (नियति) कारण है। जिस प्रकृति में रह कर वह कार्य करता है, वह भी सृष्टि से प्राप्त है। जो परिस्थितियाँ उत्पन्न होती है, वह भी नियति का स्वरूप है। यह भी सनातन धर्म सिद्धान्त है कि परिस्थिति प्राप्त होने पर मनुष्य प्रतिक्रिया देने में बाध्य है।

परिस्थिति प्राप्त होने पर प्रतिक्रिया के रूप में मनुष्य के पास तीन प्रकार के विकल्प है, जो वह अपने प्रज्ञा-विवेक के अनुसार ले सकता है:

  1. प्रतिक्रिया के रूप में किसी प्रकार के कार्य को करे अथवा न करे?
  2. प्राप्त परिस्थिति और उससे उत्पन्न प्रतिक्रिया (कार्य) से अपना सम्बन्ध मानाने अथवा न मानने?
  3. प्रतिक्रिया के रूप में कार्य किस प्रकार का हो?

कार्य करे अथवा न करे

अध्याय १८ श्लोक ७ में कहते है कि, नियति से जो भी कार्य प्राप्त होते है, उनका त्याग उचित नहीं है। ऐसा करना तामसिक कार्य है और इससे मनुष्य की कीर्ति पूर्ण रूपसे नष्ट हो जाती है।

कार्य न करना भी कार्य है।

कार्य से सम्बन्ध

भगवान श्रीकृष्ण अध्याय १८ श्लोक २३ में कहते है कि, मनुष्य को नियति से प्राप्त कार्य से किसी भी प्रकार के सम्बन्ध का त्याग करना चाहिये।

कार्य किस प्रकार के हो

मनुष्य जो भी कार्य करता है वह धर्म सिद्धान्त के अनुसार होने चाहिये।

भगवान श्रीकृष्ण अध्याय ३ श्लोक ८ में कहते है कि मनुष्य को नियति से प्राप्त कार्य, जो उसके स्वधर्म के अनुरूप हो उनको निश्चित रूप से करना चाहिये। त्याग नहीं करना चाहिये।

युद्ध करना अर्जुन का स्वधर्म था। कुरुक्षेत्र का युद्ध अर्जुन को नियति से प्राप्त हुआ था। अतः इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते है की स्वधर्म रूपी कार्य को करना श्रेष्ठ है। फिर चाहे वह कार्य कितना हो घोर क्यों न हो।

भगवान श्रीकृष्ण अध्याय १८ श्लोक ४७ में स्पष्ट करते है कि परधर्म कार्य का अनुष्ठान कितने ही अच्छे प्रकार से किया हो, तब भी स्वधर्म को करना श्रेष्ठ है। स्वधर्म का कार्य कितना ही घोर क्यों न हो, उसको करने से मनुष्य पाप को प्राप्त नहीं होता। अर्थात सैनिक युद्ध में शत्रु का वध करे तो वह पुण्य है।

अध्याय ३ श्लोक ९ में भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि यज्ञ सिद्धान्त से नियत कार्यों से अन्यत्र कार्यों को करने से मनुष्य संसार (सुख-दुःख) से बँधता है।

अध्याय ३ श्लोक १५ में वर्णन करते है कि मनुष्य को अपने कार्यों का ज्ञान और उनको करने की विधि का ज्ञान वेदों से होता है। वेदों से निर्धारित कार्यों को शास्त्र विधित कार्य भी कहते है। या मनुष्य धर्म निर्धारित कार्य भी कहते है।

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