धर्म

धर्म उस आधारभूत वैज्ञानिक सिद्धान्त का नाम है जिस के आघार पर सृष्टि प्रतिष्ठित है। सृष्टि का सृजन, कार्यरत रहना और विलीनता इस मूल सिद्धान्त की प्रक्रिया है।

 

सनातन-धर्म का ज्ञान, सृष्टि के उन आयामों को प्रस्तुत करता है, जिसको जान कर मनुष्य, मनुष्य-समाज और समस्त प्रकृति के साथ समन्वय बनता है। जिससे सभी का कल्याण होता है।

धर्म की पृष्टभूमि

आरम्भ काल से मनुष्य के समक्ष जानने के दो विषय रहे है।

  1. सृष्टि के अनेक भौतिक विषय
  2. और स्वयं को

भारतीय ऋषियों (वैज्ञानिकों) ने जितना महत्व भौतिक विषयों के ज्ञान को दिया, उतना ही महत्व उन्होंने मनुष्य की कार्यशैली (बुद्धि के कार्य) से सम्बंधित ज्ञान को दिया।

अतः भारतीय ऋषियों ने:

  1. सृष्टि के प्रतिष्ठित होने से सम्बंधित जो मूल सिद्धान्त है, उसको जाना।
  2. सृष्टि का सृजन, कार्यरत रहना और विलीनता की प्रक्रिया किस प्रकार है, इसके मूल सिद्धान्त को जाना।
  3. मनुष्य सृष्टि का अंग होने से दोनों में सम्बन्ध किस प्रकार का है और दोनों में अभेद तत्व क्या है, उसको जाना।
  4. सृष्टि, जिस यंत्र (शरीर, मन और बुद्धि) से जानी जाती है, उस यंत्र के मूल सिद्धान्त को जाना।

इस प्रकार प्राप्त हुई ज्ञान परम्परा को “धर्म” पद दिया गया।

क्योकि यह ज्ञान सृष्टि के मूल सिद्धान्तों पर आधारित है, इसलिये यह हर परिस्थिति, देश, काल में सत्य हैं। और क्योंकि इसके कुछ सिद्धान्त सृष्टि के आरम्भ का भी कारण है, इसलिये इसको सनातन-धर्म कहा जाता है।

सृष्टि के अनेक सिद्धान्तों का संग्रह और सपूर्ण ज्ञान, हिन्दू संस्कृति के सबसे पुरातन और व्यापक ग्रन्थ, चार वेदों में संकलित है।

सनातन-धर्म ज्ञानकोश के कुछ प्रमुख विषय इस प्रकार है:

 

प्रथम विषय: सांख्य ज्ञान – परमात्मतत्व सिद्धान्त

सांख्य (अध्यात्म) ज्ञान, सनातन-धर्म ज्ञानकोश का वह महत्वपूर्ण अंग है, जो मनुष्य और सृष्टि में सम्बन्ध स्थापित करता है। सबको एक सूत्र में बाँधता है।

सांख्य ज्ञान का संक्षिप्त में भाव यह है कि समस्त सृष्टि का आधार केवल और केवल परमात्मतत्व है।

परमात्मतत्व वह अति सूक्ष्म तत्व है, जो अखंड, अनन्त, अव्यय, निराकार, निगुर्ण, सर्वव्यापी, निश्चल, समरस, शाश्वत, एवं व्यापक है। यह अति सूक्ष्म तत्व (परमात्मतत्व) ही समस्त सृष्टि का ऊर्जा स्तोत्र है।

सृष्टि का कारण भी परमात्मतत्व है और कार्य भी परमात्मतत्व है। सृष्टि की उत्पत्ति भी स्वतः परमात्मतत्व से होती है; परमात्मतत्व में ही सृष्टि स्थित है; परमात्मतत्व से ही परिपूर्ण है और परमात्मतत्व में ही उसकी विलीनता है।

द्वितीय विषय: सृष्टिचक्र – यज्ञ सिद्धान्त

सनातन-धर्म ज्ञानकोश का दूसरा मूल और मुख्य विषय है यज्ञ सिद्धान्त।

  1. मनुष्य को सृष्टि किस प्रकार से प्रभावित करती है?
  2. मनुष्य का सृष्टिचक्र में योगदान किस प्रकार है?
  3. मनुष्य का प्रकृति के साथ समन्वय किस प्रकार हो?

इन विषय को लेकर भारतीय ऋषियों ने सृष्टि का अवलोकन और अध्यन किया।

यज्ञ क्या है?

आकाशगंगा, सौरमंडल, नक्षत्र, भूमण्डल, को मिला कर सृष्टि प्रतिष्ठित है। भूमण्डल मे भी वायु, अग्नि, जल, आकाश, पृथ्वी, जड़-चेतन प्राणी एवं अन्य अनेक प्रकार के प्रदार्थ है।

अगर सृष्टि एक इकाई है तो इस सृष्टि में जो भी प्रतिष्ठित है, वह इस इकाई के घटक है।

सृष्टि के प्रत्येक घटक में कुछ क्रियाएँ होती रहती है उन क्रियाओं का आरम्भ और अंत होता है। प्रत्येक घटक में होने वाली क्रिया, अन्य घटक पर प्रभाव डालती है और स्वयं भी प्रभावित होती है। एक-दूसरे के प्रभाव में प्रत्येक घटक में क्रिया-प्रतिक्रिया का चक्र चलता रहता है।  एक दूसरे के प्रभाव से ही सृष्टि प्रतिष्ठित है और क्रियाशील है।

भूमण्डल मे जितने भी जड़-चेतन प्राणी है, उनकी सब की उत्त्पति-उपस्थिति-विनाश का चक्र निरन्तर चलता रहता है। घटक जिन भौतिक तत्वों से बना है, उन तत्वों की भी उत्त्पति-उपस्थिति-विनाश का चक्र निरन्तर चलता रहता है। भूमण्डल के जड़-चेतन प्राणी अपने आस्तित्व के लिये जीवन निर्वाह की सामग्री भूमण्डल से प्राप्त करते है और स्वयं भी अन्यों के लिये आहार बनते है।

यज्ञ सिद्धान्त के अनुसार, क्रिया-प्रतिक्रिया, आरम्भ-अंत की निरन्तर चलने वाली चक्र क्रिया यज्ञ है।

तृतीया विषय: घटक का धर्म – गुण सिद्धान्त

सृष्टि के प्रत्येक घटक में होने वाली क्रिया (क्रिया-प्रतिक्रिया; उत्त्पति-उपस्थिति-विनाश) एक निश्चित रूप में होती है। भूमण्डल के जड़-चेतन प्राणी भी एक निश्चित प्रकार से कार्य करते है। अतः सृष्टि के घटक में निश्चित रूप से होने वाली क्रिया/कार्य को उस घटक का गुण अथवा प्रकृति कहते है।

घटक के गुणों के कारण, घटक जो कार्य करता है, वह उस घटक का गुण-धर्म (करने योग्य कार्य) कहा गया है।

जल का धर्म बहना है, अग्नि का धर्म जलाना है, वृक्ष का धर्म फल-फूल देना है, आदि।

मनुष्य भी अपने गुणों के अनुरूप कार्य करता है, जो उसका गुण-धर्म कहलाता है।

मनुष्य और अन्य प्राणियों के गुणों में भेद

भूमण्डल के जड़-चेतन प्राणी एक परिसीमा में रह कर जीवन-निर्वाह और प्रजनन सम्बंधित कार्य ही कर सकते हैं, करते हैं। इसके विपरीत मनुष्य कुछ भी करने, रचने में सक्षम है।

मुख्यतः सभी प्राणी जीवन-निर्वाह के लिये, अपने-आप में सक्षम है। केवल शिशुकाल को छोड़ कर, उनको अपने किसी अन्य साथी की सहायता की आवश्यकता नहीं होती।

इसके विपरीत मनुष्य को अपने जीवन-निर्वाह के लिये भी अन्य साथियों की आवश्यकता होती है। क्योंकि, मनुष्य को जो गुण प्राप्त है, वह सभी व्यक्तियों में एक समान नहीं है। और इसी कारण से मनुष्य समाज में रहने के लिये बाध्य है।

जड़-चेतन प्राणी अन्य घटकों के प्रभाव में अपने गुणों से निर्धारित कार्य करता ही है। इसके विपरीत मनुष्य किसी भी कार्य को करने अथवा न करने का निर्णय लेने में स्वतंत्र है।

निर्णय, उस कार्य को करने का है, जो मनुष्य स्वयं के लिये “करने-योग्य” मानता हो।

बुद्धि और प्रज्ञा-विवेक वह महत्वपूर्ण गुण है जो मनुष्य को कुछ भी रचने में सक्षम और निर्णय लेने की स्वतंत्रता प्रदान करते है।

प्रज्ञा-विवेक तभी उचित निर्णय लेने में सक्षम होंगे, जब उनको न केवल भौतिक विषय का ज्ञान हो, अपितु बुद्धि किस प्रकार कार्य करती है, इसका भी ज्ञान हो।

अतः मनुष्य जब अपने गुणों के विषय में पूर्ण ज्ञान प्राप्त करता है, तब मनुष्य को करने-योग्य कार्य निर्धारित करने सहयता होती है।

चतुर्थ विषय: योग सिद्धान्त

बुद्धि किस प्रकार कार्य करती है? इसका ज्ञान योग सिद्धान्त से प्राप्त होता है, ।

वर्तमान ज्ञान परम्परा में जो विषय मनोविज्ञान, व्यवहार विज्ञान और सामाजिक विज्ञान के नाम से जाने जाते है, वह सभी योग सिद्धान्त में समाहित है।

मनुष्य के कार्य करने में मन, बुद्धि, प्रज्ञा-विवेक, चित, अहंकार और चेतना का अहम योगदान है। परन्तु इनमें ही उत्पन्न होती है – वृत्तियाँ, विषमतायें। सही कार्य को करने का निर्णय, और सही प्रकार से करने के लिये यह आवश्यक है की अन्तःकरण की इन विषमताओं, वृत्तियों को नियमित किया जाये। अन्यथा यह करने-योग्य कार्य (कर्तव्य) निर्धारण में, व्यवधान डालती है।

विषमताओं को नियमित कर, उनका त्याग करना, समता में स्थित होना है। समता में स्थित होने की जो प्रक्रिया है, उसको योग साधना कहते है। समता में स्थित होना ही योग में स्थित होना है। अतः योग पद क्रिया और क्रिया का फल (गंतव्य) दिनों का वाचक है।

अध्याय २ श्लोक ४८समत्वं योग उच्यते’ – समता को प्राप्त करना ही योग कहलाता है।

योग साधना – कर्तव्य निर्धारण में और योग में स्थित होने में सहायक होती है।

अध्याय २ श्लोक ५०योगः कर्मसु कौशलम्’ – योग के अनुरूप किये जानेवाले कार्य ही कुशल कार्य है।

योग सिद्धान्त के विषय में पूर्ण ज्ञान प्राप्त करके, उसको आचरण में लाने से मनुष्य का कल्याण होता है।

मनुष्य धर्म

भारतीय ऋषियों ने इस प्रकार सृष्टि के मूल सिद्धान्तों का अध्यन करके सनातन धर्म ज्ञान परम्परा स्थापित की। मनुष्य इन सिद्धान्तों के अनुरूप कार्य किस प्रकार निर्धारित करे, इसका विषय प्रस्तुत किया। मनुष्य द्वारा सनातन धर्म सिद्धान्त के अनुरूप किये जाने वाले कार्यों को मनुष्य धर्म कहा।

भारतीय ऋषियों ने सनातन धर्म ज्ञान परम्परा को इस प्रकार प्रस्तुत किया कि मनुष्य का विवेक स्वयं निर्धारित करे की उसके लिये क्या उचित-अनुचित है। किसी प्रकार की बाध्यता प्रस्तुत नहीं की।

 

धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष

धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]

Read More

अध्याय