योग

अन्तःकरण की वृतियो को सयंमित कर समता में स्थित होना योग है।

 

योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:

(पतंजलि योग सूत्र – श्लोक १-२)

चित्त की वृत्तियों का निरोध करना योग है।

 

समत्वं योग उच्यते।

(श्रीमद भगवद गीता – श्लोक २-४८)

समता में स्थित होना ही योग कहलाता है।

 

योग में स्थित होना ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है। योग मनुष्य जीवन का गंतव्य है। और गंतव्य तक पहुंचने के लिये जो क्रिया, जिस प्रकार की जाती है, वह भी योग है।

योग दर्शन

अन्य प्राणीओं की तुलना में मनुष्य को बुद्धि और कार्य करने की कुशलता विशिष्टता से प्राप्त है। मनुष्य के कार्य करने में चेतना और भाव विशेष रूप से प्रभाव डालते है। चेतना, बुद्धि, एवं भाव के कारण ही मनुष्य विशिष्ट प्राणी कहलाता है।

चेतना, बुद्धि, एवं भाव किस प्रकार कार्य करते है और इनका परिस्पर क्या सम्बन्ध है, इस विज्ञान को योग कहते है।

योग में की जाने वाली क्रिया और योग में स्थित होने की प्रकिया शुद्ध विज्ञान पर अधारित है। और इस ज्ञान, विज्ञान को योग दर्शन कहते है।

समाजिक प्राणी होने के कारण मनुष्य का आचरण समाज में किस प्रकार का हो, इसका विज्ञान भी योग दर्शन में समाहित है।

आज के निम्न आधुनिक विज्ञान के मूल सिद्धांत योग दर्शन में समाहित है

  1. तत्त्वमीमांसा (MetaPhysics)
  2. व्यवहार विज्ञान (Behaviour Sceince)
  3. समाजिक विज्ञान (Social Sceince)
  4. मनोविज्ञान (Psychology)

सनातन धर्म संस्कृति का पालन करने वाले ऋषियों ने योग दर्शन के महत्त्व को जाना। ऋषियों ने सृष्टि के मूल सिद्धांतों का अध्ययन और उनका संकलन किया। संकलित सिद्धांतों में से प्रयुक्त विज्ञान का निर्माण किया। संकलित सिद्धांतों और प्रयुक्त विज्ञान को योग दर्शन के रूप में प्रस्तुत किया।

सनातन धर्म संस्कृति का पालन करने वाले जान समुदाय ने अपने जीवन शैली को योग दर्शन के अनुरूप किया।

ऋषियों ने मनुष्य जीवन को चार आश्रम में विभाजित किया और शिशु काल से ही इसका पालन करना आरम्भ किया।

  1. ब्रह्मचर्य
  2. गृहस्त
  3. वानप्रस्थ
  4. सन्यास

योग दर्शन में वृत्तियों का निरोध या समता में स्थित क्यों होना है?

वृत्ति निरोध

मनुष्य में स्थित भाव, मनुष्य द्वारा किये जाने वाले कार्य में विशेष प्रभाव डालते है। योग दर्शन कहता है कि मनुष्य में स्थित यह भाव सयंमित न होने पर यह भाव अन्तःकरण की वृत्तियाँ, विषमता है।

ममता, आसक्ति एवं अहंकार मूल वृति है। और इनसे उत्पन्न होती है कामना, राग-द्वेष, भय, क्रोध आदि वृत्तियाँ।

यह सभी वृत्तियाँ अन्य प्राणी, वस्तुओं के सम्बन्ध को लेकर होती है। इन वृतियों के कारण मनुष्य कुछ कार्य करता है और कुछ नहीं करता। अर्थात मनुष्य के कार्य इन वृतियों प्रभाव में होते है। अन्य शब्दों में कहे तो मनुष्य के कार्य इन वृतियों के बंधन में होते है।

जिस प्रकार एक यंत्र अपनी क्षमता के अनुरूप कार्य करता है। और यंत्र के कार्य भाव से प्रभावित नहीं होते। क्योकि यंत्र में कोई भाव नहीं होते। इसी प्रकार मनुष्य शरीर भी एक यंत्र है, जिसके कार्य शरीर की क्षमता के अनुरूप होनी चाहिये। परन्तु मनुष्य में भाव होने के कारण, शरीर के कार्य उन भावों से प्रभावित हो जाते है।

यह ही कारण है की प्रत्येक व्यक्ति के कार्य एक ही परिस्थिति में भिन-भिन होते है। इसका मुख कारण है व्यक्ति के भिन-भिन भाव।

साथ ही मनुष्य इन भाव के कारण सुख-दुःख का भी अनुभव करता है।

अतः अगर मनुष्य इन वृतियों को सयंमित करे तो मनुष्य की कार्य करने की यथा शक्ति बहुत अधिक बड़ सकती है।

समता युक्त

वृति अथवा विषमता का विपरीत भाव है समता। अतः अगर मनुष्य समता में स्थित होने के लिये साधना करे तो वह सुख-दुःख के चक्र, भय, क्रोध से मुक्त हो सकता है।

समता में स्थित होने पर मनुष्य वह सभी कार्य करेगा या नहीं करेगा जो धर्म पूर्ण हो। जो मनुष्य, समाज और प्रकृति के लिये कल्याणकारी हो। उसके कार्य वृतियों से प्रभावित नहीं होंगे।

समता में स्थित होने के लिये जो साधना है और समता में स्थित होने पर जिस प्रकार के कार्य है, वह ही योग साधना है। और इसका ज्ञान-विज्ञान योग दर्शन है।

भगवान श्रीकृष्ण सर्व प्रथम अध्याय २ श्लोक ४८ में कहते है कि समता को अन्तःकरण में स्थित करना ही योग कहलाता है।

इसी विषय को विपरीत शब्दों में भगवान श्रीकृष्ण अध्याय ६ श्लोक २३ में कहते है।

भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि जिस मनुष्य में दुःखों के संयोग का ही वियोग है, उसी को ‘योग’ नामसे जानना चाहिये। अतः जो मनुष्य दुःखों से रहित है, वह समता में स्थित है, और वह स्थिति योग की स्थिति है।

अध्याय २ श्लोक ५३ में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से पुनः कहते है कि जिस काल में तुम्हारी बुद्धि समता में अचल और स्थित हो जायेगी, तब तुम योग को प्राप्त हो जाओगे।

अतः इन तीन श्लोकों से स्पष्ट होता है कि योग के द्वारा मनुष्य के अन्तःकरण में समता का भाव स्थित होता है। और समता में स्थित होना ही योग में स्थित होना है।

योग में स्थित होना ही, ब्रह्म (परमात्मा) की प्राप्ति है।

अध्यात्म की दृष्टि से यह अति महत्पूर्ण विचार है। मनुष्य प्राय कहता तो है कि उसको परमात्मा की प्राप्ति करनी है। परन्तु परमात्मा प्राप्ति की अर्थ क्या है, वह नहीं जानता!

इस विषय पर अध्याय ५ श्लोक १९ में भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि जिसका अन्तःकरण समता में स्थित है, वह ब्रह्म (परमात्मा) में ही स्थित हैं।

इसका कारण यह है कि, ब्रह्म – निर्विकार, निर्लिप्त, और निर्दोष है। और जब मनुष्य समता में स्थित हो जाता है, तब उसका अन्तःकरण भी निर्विकार, निर्लिप्त, निर्दोष हो जाता है। जो की परमात्मा के गुण है। अतः समता में स्थित होने पर मनुष्य उस स्थिति को प्राप्त कर लेता है जो परमात्मा (ब्रह्म) की स्थिति (गुण) है।

ब्रह्म में स्थिति मनुष्य के क्या गुण होते है, इसका वर्णन अध्याय ५ श्लोक २० में हुआ है, जो की योग की स्थिति है।

अन्तःकरण की किस स्थिति में मनुष्य योग युक्त और ब्रह्म में स्थित हो जाता है, इसका वर्णन अध्याय ५ श्लोक २१ में हुआ है।

अध्याय ५ श्लोक २६ में भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि जो मनुष्य विषमता से मुक्त है और समता में स्थित है, वह सभी समय निर्वाण ब्रह्म से परिपूर्ण है।

इस प्रकार अन्य कई श्लोकों में भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया है कि समता में स्थित होना ही परमात्मा की प्राप्ति है।

योग में स्थित होने के लिये मनुष्य को साधना किस प्रकार करनी है?

सरल शब्दों में यदि कहा जाय तो, वह सभी कार्य जो मनुष्य में समता का भाव उत्त्पन्न करे, वह सब कार्य योग में स्थित होने के साधन है।

योग साधना के चार मुख्य बिंदु है जिसके सहयोग से मनुष्य योग में स्थित होता है।

  1. कर्म योग
  2. सांख्य योग
  3. भक्ति योग
  4. ध्यान योग

प्राय विद्वान् लोग इन सभी योग की प्रक्रिया को अलग-अलग प्रक्रिया और साधना के अलग-अलग मार्ग मानते है।

परन्तु भगवान श्रीकृष्ण श्रीमद् भगवद् गीता में अनेक प्रकार से स्पष्ट करते है कि यह सभी एक ही साधना के चार अलग भाग (बिंदु) है। इन सभी बिंदुओं पर कार्य करने से योग की सिद्धि होती है।

किसी एक बिंदु पर कार्य करने से और उसको सिद्ध करने से योग की सिद्ध नहीं होती। और जिस साधक का योग सिद्ध है, उसका चारो योग में सिद्धि होना निश्चित है।

संक्षिप्त में इन चारों योग बिंदुओं का अर्थ इस प्रकार है।

कर्म योग

मनुष्य के जीवन में कार्य किस प्रकार के हो जिससे उसके अन्तःकरण में समता स्थित हो और स्थित रहे, वह सब कार्य कर्म योग साधना के अन्तर्गत आ जाते है।

कर्मयोग सम्पूर्ण योग साधना का मुख्य बिंदु है। कारण कि मनुष्य शरीर में – मानसिक और शारीरिक क्रियाएं निरंतर होती रहती है। मानसिक और शारीरिक क्रियाएं किस प्रकार हो जिससे अन्तःकरण में समता स्थित हो, इसका ज्ञान और इसकी साधना कर्मयोग साधना है।

मनुष्य जब तक संसार के विषयों से अपना सम्बन्ध मानता और उनको प्राप्त करने के लिये कार्य करता है, तब तक उसके अन्तःकरण में विषमता बनी रहती है।

इस के विपरीत मनुष्य के मानसिक और शारीरिक क्रियाएँ जब अन्यों के लिये हो जाती है, तब वह समता में स्थित हो जाता है। और इस प्रकार मानसिक और शारीरिक क्रियाओं को संसार के कल्याण में लगाने की जो प्रक्रिया है, वह कर्म योग साधना है।

साथ ही, संसार कल्याण के लिये कार्य करना संसार के प्राणी, पदार्थ, पर्यावरण की सेवा करना मनुष्य जीवन का कर्तव्य है – मनुष्य धर्म है।

इस विषय पर अध्याय ३ श्लोक १० में ब्रम्हाजी मनुष्य को प्रकृति के लिये कार्य करने की आज्ञा देते है और कहते है की प्रकृति के लिये कार्य करना ही तुम्हारा कर्तव्य है।

अध्याय ३ श्लोक ११ में कहते है कि कर्तव्यों को करने में ही तुम्हारा कल्याण है। यहा कल्याण होने का अर्थ है समता (परमात्मा) की प्राप्ति।

कर्तव्य पालन की महत्ता को बताने के लिये भगवान श्रीकृष्ण अध्याय ३ श्लोक २२ में कहते है कि, मैं स्वयं अपने कर्तव्यों को तत्प्रता से करता हूँ।

इस प्रकार कर्तव्य करना कर्म योग है और कर्तव्य पालन से ही मनुष्य समता में स्थित होता है।

सांख्य योग

मनुष्य के सभी कार्य बुद्धि से होते है। अतः किसी भी प्रकार के कार्य को करने के लिये बुद्धि को यथोचित ज्ञान होना अनिवार्य है। अतः समता प्राप्ति के लिये तत्व ज्ञान, आत्म ज्ञान, प्राकृतिक विज्ञान का अध्यन, चिन्तन करने कि जो प्रक्रिया उसको सांख्य योग कहा गया है।

मनुष्य शरीर द्वारा होने वाली क्रियाओं में बुद्धि सहायक है, परन्तु मूढ़ता वश बुद्धि को अहंता होती है कि सभी कार्य वह करता है। इस मूढ़ता का त्याग विवेक की जाग्रति से होती है।

शरीर – शरीरी में क्या भेद है? आत्मा, परमात्मा क्या है? संसार क्या है और परमात्मतत्व क्या है? कर्त्ता कौन है और कारण कौन है? इन सब का ज्ञान होने से मनुष्य का विवेक जाग्रत होता है। इन सब प्रश्नों का उत्तर जान कर विवेक को जाग्रत करने की जो प्रक्रिया है, उस साधना को सांख्य योग साधना कहते है।

मनुष्य में भोग और कामना पूर्ति की प्रवृति होती है, जो उसको अपने कर्तव्य करने से विमुख करती है। सांख्य योग के द्वारा प्राप्त तत्व ज्ञान से मनुष्य अपने कर्तव्य करने में सक्षम हो पता है।

विवेक की जागृति होने से प्रकृति, शरीर और शरीरी का ठीक-ठीक भेद होता है। ठीक-ठीक भेद होने पर शरीर,  प्राकृतिक पदार्थ, और सम्बंधों के प्रति जो ममता एवं आसक्ति होती,  उसको त्याग करने में सहयता होती हैं।

अतः सांख्य योग, कर्म योग की सिद्धि में सहायक है।

प्राय विद्वानों का विचार होता है कि सांख्य योग साधना में कर्मों का त्याग होता है। इसी विषय को लेकर अर्जुन अध्याय ३ श्लोक १ में प्रश्न करते है। इसके उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण अध्याय ३ श्लोक ३ से श्लोक ८ में इस विचार का पूर्ण रूप से खंडन करते है।

भक्ति योग

भक्ति से कर्म योग की सिद्धि

मनुष्य में शरीर के प्रति ममता और आसक्ति होती है। जिसके कारण मनुष्य को संसार के विषयों के प्रति आकर्षण होता है। संसार के विषयों के प्रति आकर्षण होने के कारण मनुष्य विषयों की कामना करता है, उनको प्राप्त करने के लिये कार्य करता है। विषय की प्राप्ति होने पर उसका भोग करता है। यह सभी कार्य मनुष्य के अन्तःकरण में विषमता उत्त्पन्न करती है।

इस विषमता का त्याग तभी संभव है जब उसके कार्य स्वयं के लिये न होकर अन्य के लिये हो।

मनुष्य को प्रकृति से एक गुण ओर प्राप्त है, जिसको प्रेम कहते है। मनुष्य जब किसी प्राणी-पदार्थ से अत्याधिक प्रेम करता, तब उसके कार्य स्वयं के लिये न होकर उस प्राणी-पदार्थ के लिये हो जाते है। प्रेम की इस अवस्था में मनुष्य की स्वयं के शरीर से अधिक महत्ता उसके लिये हो जाती है, जिससे वह प्रेम करता है।

इस प्रेम को ही भक्ति कहते है। और जब यह भक्ति परमात्मा के प्रति होती है, तब यह परमात्मा की भक्ति कही जाती है। परमात्मा की भक्ति में मनुष्य के सभी कार्य परमात्मा की प्रसन्ता के लिये होते है, स्वयं के लिये नहीं।

क्योकि परमात्मा की भक्ति में परमात्मा के लिये कार्य होते है, इसलिये इस प्रकार की साधना को भक्ति योग साधना कहते है।

परमात्मा के लिये कार्य करने का अर्थ है, प्रकृति के लिये कार्य करना। अपने कर्तव्यों को करना। समाज कल्याण के लिये कार्य करना। अन्यों को सुख देना। और यह ही कर्म योग है। अतः भक्ति से कर्म योग की सिद्धि होती है।

भक्ति से सांख्य योग की सिद्धि

भक्ति योग में क्योकि मनुष्य में स्वयं से अधिक महत्ता परमात्मा की होती है, और वह सभी कार्यों का कारण परमात्मा को मानता है, इसलिये भक्ति से अहंता का त्याग होता है।

सांख्य योग में भी विवेक जाग्रत होने पर अहंता का त्याग होता है। अतः अहंता के सन्दर्भ में सांख्य योग और भक्ति योग का एक ही फल है। क्रिया (अन्यों के लिये) के सन्दर्भ में भक्ति योग और कर्म योग का एक ही फल है।

यहाँ एक विशेष बात विचार करने की है कि परमात्मा के लिये कार्य किस प्रकार के होते है? मनुष्य को सृष्टि की रचना और उसकी क्रियाशीलता को देख कर परमात्मा के होने का अनुभव होता है। अतः परमात्मा के लिये कार्य करने का अर्थ है, सृष्टि, संसार के लिये कार्य करना। अर्थात संसार के कल्याण, सेवा के लिये कार्य करना, जो मनुष्य का कर्तव्य भी है।

अतः भक्ति योग और कर्म योग में मनुष्य के कार्य एक प्रकार के ही है। और वह है कर्तव्य रूपी, जिसका वर्णन कर्म योग में हुआ है।

ध्यान योग

मनुष्य को संसार का ज्ञान इन्द्रियों के द्वारा बुद्धि को होता है। इन्द्रियों के विषय में राग-दुवेश होने मनुष्य में संसार का चिन्तन बना रहता है। संसार का चिन्तन होने से कामना बनी रहती है।

मन में इन्द्रियों के विषयों के प्रति जो आकर्षण है उसको नियमित करने में ध्यान योग सहायक विधि है। मन में जो सुफुरणा का उत्तपन्न होना है उनके प्रति उदासीनता लाने में भी ध्यान योग सहायक है। साधक को दिन और रात में जब शारीरक निर्वाह हेतु कोई कार्य एवं कोई कर्तव्य प्राप्त नहीं है, उस समय साधक को ध्यान योग का पालन करना चाहिये।

अतः भगवान श्रीकृष्ण अध्याय ६ श्लोक १० कहते है कि, जब मनुष्य को सांसारिक कर्तव्य न हो, तब वह एकांत समय में परमात्मा का चिन्तन करे। परमात्मा का चिन्तन किस प्रकार हो, इसका वर्णन अध्याय ६ श्लोक ११ से श्लोक १७ में हुआ है। इस प्रकार की साधना को ध्यान योग साधना कहते है। इस प्रकार की साधना करने से मनुष्य को संसार से विमुख होने में सहयता मिलती है।

इस प्रकार सभी प्रकार के योग (कर्म, सांख्य, भक्ति और ध्यान) साधना, सामूहिक रूप से योग में स्थित होने में सहायक है। किसी भी एक बिन्दु पर कार्य करने पर योग की सिद्धि नहीं है।

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