सांख्य ज्ञान, सांख्य सिद्धान्त पर आधारित है।
यह सांख्य सिद्धान्त उस मूल तत्व के विषय का वर्णन करता है जो सृष्टि के प्रतिष्ठित और क्रियाशील होने का कारण है। सांख्य सिद्धान्त ज्ञान परम्परा में वह मूल तत्व “परमात्मतत्व” पद से जाना जाता है।
सांख्य सिद्धान्त यह कहता है कि:
“परमात्मतत्व सृष्टि का अति सूक्ष्म मूल तत्व है, जो सृष्टि के होने का कारण भी है और कार्य भी है। सृष्टि की उत्पत्ति भी स्वतः परमात्मतत्व से होती है; परमात्मतत्व में ही सृष्टि स्थित है; परमात्मतत्व से ही परिपूर्ण है और परमात्मतत्व में ही उसकी विलीनता है। यह अति सूक्ष्म मूल तत्व, अखंड, अनन्त, अव्यय, निराकार, निगुर्ण, सर्वव्यापी, निश्चल, समरस, शाश्वत, एवं व्यापक है। परमात्मतत्व ही समस्त सृष्टि का ऊर्जा स्तोत्र है”।
समस्त सृष्टि, सृष्टि के प्राणी और मनुष्य, परमात्मतत्व की अध्यक्षता में किस प्रकार कार्य करते है, मनुष्य और परमात्मतत्व में क्या सम्बन्ध है, किस प्रकार का है, यह सब विज्ञान, सांख्य ज्ञान के अंतर्गत आता है।
भगवान श्रीकृष्ण, अध्याय २ श्लोक १२ से अध्याय २ श्लोक ३० में देही-देह, प्रकृति-परमात्मतत्व, नित्य-अनित्य, सत्-असत्, में क्या अंतर है इसका परमात्मतत्व ज्ञान देते है। परमात्मतत्व का ज्ञान सांख्य ज्ञान है, इसका वर्णन भगवान श्रीकृष्ण, अध्याय २ श्लोक ३९ में करते है।
अध्याय ७ श्लोक ०४ से अध्याय ७ श्लोक १५ में भगवान् श्रीकृष्ण ने अपरा-परा, गुण सम्बंधित सांख्य विषयक ज्ञान दिया है।
अध्याय ९ में परमात्मतत्व के विज्ञान का वर्णन विस्तार से किया है। भगवान् श्रीकृष्ण ने अध्याय ९ श्लोक ०१ में इस विज्ञान को अत्यन्त गूढ़ विज्ञान कहा है।
परमात्मतत्व समस्त सृष्टि का मूल तत्व है और संसार के होने का कारण है, इस का वर्णन भगवान् श्रीकृष्ण ने अध्याय १० में किया है।
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो विज्ञान है उसका वर्णन भगवान् श्रीकृष्ण ने अध्याय १३ में किया है।
सनातन धर्म ज्ञान परम्परा में जिन सिद्धान्तों का वर्ण हुआ है, वह इस प्रकार है।
इन सिद्धान्तों में से योग सिद्धान्त मनुष्य की बुद्धि और उसके कार्यों से सम्बंधित है।
मनुष्य के कार्य करने में मन, बुद्धि, प्रज्ञा-विवेक, चित, अहंकार और चेतना का अहम योगदान है। परन्तु इनमें ही उत्पन्न होती है – वृत्तियाँ, विषमतायें। सही कार्य को करने का निर्णय, और सही प्रकार से करने के लिये में यह वृत्तियाँ, विषमतायें व्यवधान डालती है। इस वृतियो को अगर सयंमित न किया जाय, तो यह न केवल मनुष्य के स्वयं के लिये हानिकारक होती है, अपितु समस्त संसार के लिये हानि कारक हो जाती है।
अतः यह आवश्यक है की अन्तःकरण की इन विषमताओं, वृत्तियों को नियमित किया जाये।
यह वृत्तियाँ, और विषमतायें किस प्रकार और क्यों उत्पन्न होती है? इनको नियमित क्यों करना है और किस प्रकार करना है? इन सभी प्रश्नों का उत्तर प्राप्त होता है- योग सिद्धान्त और और उससे सम्बंधित ज्ञान से।
विषमताओं को नियमित कर, उनका त्याग करने से मनुष्य समता में स्थित हो जाता है। समता में स्थित होने की जो प्रक्रिया है, उसको योग साधना कहते है।
मनुष्य में उत्पन्न होने वाली अनेक वृत्तियों में एक महत्वपूर्ण वृति है – अहंता।
अहंता का त्याग करने में सांख्य ज्ञान सहायक होता है। सांख्य ज्ञान को ग्रहण करके की जाने वाले योग साधना को सांख्य योग कहते है।
अहंता के कारण मनुष्य यह मानता है कि “मैं” कार्य को करता हूँ। सत्य यह है कि होने वाले कार्य का मूल कारण परमात्मतत्व है। परमात्मतत्व किस प्रकार सभी कार्यों का कारण है, इसका ज्ञान सांख्य ज्ञान को ग्रहण करने से होता है।
जब साधक वृत्तियों को समाप्त करने के लिये सांख्य ज्ञान के सहयोग से, साधना करता है, तब उस साधना को सांख्य योग कहते है।
सांख्य योग साधना में रत साधक को जब यह अनुभव हो जाता है कि उसके द्वारा होने वाले कार्यों का कर्त्ता वह स्वयं नहीं है, तब उसमे अहंता का त्याग हो जाता है। ऐसे साधक को तब ज्ञानी कहा जाता है।
भगवान श्रीकृष्ण, अध्याय ३ श्लोक ०३ में कहते है की सांख्य ज्ञान प्राप्ति के द्वारा योग साधना करने वाले योगियों की निष्ठा सांख्य ज्ञान में होती है।
मनुष्य जब सांख्य योग साधना करता है, तब पूर्ण ज्ञान न होने के कारण मनुष्य को कर्त्ता भाव को लेकर भ्रम हो जाता है। भ्रम के कारण वह यह मान लेते है कि जब वह कर्त्ता नहीं है तब उनके लिये कोई कार्य भी नहीं है। ऐसा ही भाव अर्जुन अध्याय ३ श्लोक ०१ में व्यक्त करते है।
अर्जुन, भगवान श्रीकृष्ण से कहते है कि जब ज्ञान प्राप्त करके योग को सिद्ध किया जा सकता है, तब आप मुझे युद्ध जैसे घोर कर्म में कियों लगाते हो?
इस विषय को स्पष्ट करने के लिये भगवान श्रीकृष्ण, ने अध्याय ३ श्लोक ०३ से अध्याय ३ श्लोक ०८ के श्लोक कहे है। सांख्य ज्ञान प्राप्ति से अहंता का त्याग है, परन्तु मनुष्य को यज्ञ के लिये कार्य तो निश्चित ही करने है।
कामना, राग-द्वेष आदि कुछ अन्य वृत्तियाँ है, जिनका त्याग साधक अपने मनुष्य धर्म का पालन के द्वारा करता है। इस प्रकार वृत्तियों को सयमित एवं त्याग करने की साधना को कर्मयोग कहते है। वृत्तियों एवं विषमताओं को सयमित करने की साधना किसी प्रकार से भी की जाय, आती सभी योग साधना के अन्तर्गत ही है। और योग साधना में कर्म करना अनिवार्य है।
संसार, संसार के पदार्थों, और कर्मों से सम्बन्ध मानने के कारण ही मनुष्य के अन्तःकरण में वृत्तियाँ उत्पन्न होती है। अतः सांख्य ज्ञान यह कहता है कि मनुष्य सम्बन्ध का त्याग करे।
परन्तु इस विषय में पूर्ण ज्ञान न होने के कारण साधक संसार से सन्यास और कर्मों से सन्यास को साधना मान लेता है। प्राय साधक यह मान लेता है की सांख्य का अर्थ ही सन्यास है और सन्यास के द्वारा परमात्मा की प्राप्ति होती है। कर्मों (मनुष्य धर्म) के द्वारा की जाने वाली साधना कर्मयोग है, जो पृथक है।
अध्याय ५ श्लोक ०४ से अध्याय ५ श्लोक १४ के द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण ने इस भ्र्म को दूर किया है।
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