मनुष्य जब किसी के लिये कुछ अपनी क्षमता से अधिक करता है तब वह उसका उदार पूर्ण कार्य है।
मनुष्य जब दान करता है, और जितना करना चाहता है, उससे अधिक दान करता है, तब वह उसकी दान करने में उदारता है।
जो वस्तु मनुष्य पहले अपनी मानता है और फिर वह उसको दूसरे की मान लेता है, तब वह मनुष्य की उदारता है।
संसारिक दृष्टि से मनुष्य को उदार भाव का होना चाहिये। और उदार भाव होना मनुष्य का गुण माना जाता है। मनुष्य को दान और धर्म के कार्य करने चाहिये। ऐसा करने से समाज में सदभावना उत्त्पन्न होती है।
परन्तु आध्यात्मिक दृष्टि से उदार भाव अन्तःकरण की एक विषमता है।
कारण कि उदार भाव तभी उत्पन्न होगा जब मनुष्य में अहंता का भाव होगा। मनुष्य के पास जब कोई वस्तु होती है, जो अन्यों के पास न हो, तब मनुष्य को उस वस्तु के होने की अहंता होती है। उसको अहंता होती है कि उसने परिश्रम से वह वस्तु प्राप्त की है।
मनुष्य जब शरीर से सम्बन्ध मानता है, तब शरीर के द्वारा होने वाले कार्यों का कर्त्ता वह स्वयं को मानता है। जबकि शरीर के द्वारा होने वाले कार्यों का कारण परमात्मा है, न की मनुष्य स्वयं। इस प्रकार प्राप्त वस्तु और कार्यों में अहंता होना विकार है। कार्यों में अहंता होने से मनुष्य कार्यों से बंधता है और वह पाप-पुण्य का भागी होता है।
अतः उदारता का भाव अहंकार से उत्त्पन्न होता है। और अहंकार होना विषमता है।
जो मनुष्य कार्यों का कर्त्ता स्वयं को न मान कर परमात्मा को मानता है, तब वह परमात्मा का भक्त कहलाता है। मनुष्य जब यह मानता है कि उसको संसार से प्राप्त होने वाली वस्तु का कारण परमात्मा है, वह स्वयं नहीं, तब वह भक्त कहलाता है।
अध्याय ७ श्लोक १६ में भगवान श्रीकृष्ण ने वर्णन किया है की कुछ विशेष परिस्थिति में अहंकारी मनुष्य परमात्मा की भक्ति करता है।
मनुष्य जब किसी विषम संकट, परिस्थिति में होता है, तब वह परमात्मा की भक्ति करता है। ऐसा भक्त आर्त कहलाता है।
जब मनुष्य किसी वस्तु को प्राप्त करने की कामना करता है और स्वयं से उसको प्राप्त करने में असमर्थ पता है, तब वह परमात्मा की भक्ति करता है। ऐसा भक्त अर्थार्थी कहलाता है।
अध्याय ७ श्लोक १८ में भगवान श्रीकृष्ण ने इन दो प्रकार के भक्तों को उदार कहा है।
क्योकि कुछ परिस्थिति वश वह कुछ कार्यों का कर्त्ता स्वयं को न मान कर परमात्मा को मान लेते है। जब कुछ परिस्थिति प्रतिकूल हो जाती है, तब वह ऐसा विचार रखते है की केवल परमात्मा ही उनको विषम संकट से बहार निकाल सकते है, कामना पूरी कर सकते है। और तब वह कार्य के फल का श्रय परमात्मा को देते है। अन्यथा वह अहंकारी मनुष्य सभी कार्यों का कर्त्ता स्वयं को मानते है। इसलिये वह उदार कहलाने योग्य है।
ऐसा उदार भाव कुछ परिस्थिति में होना भी शुभ है। परन्तु ऐसा भाव निरन्तर रहना चाहिए, किसी विशेष परिस्थिति में नहीं।
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ है। यह चार पुरुषार्थ को करना ही मनुष्य जीवन का उदेश्य है। उद्देश्य इसलिये है क्योंकि इन चार पुरुषार्थ को करने से ही मनुष्य का कल्याण है। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, का अर्थ क्या है? यह पुरुषार्थ करने से मनुष्य का कल्याण किस प्रकार है? धर्म धर्म का अर्थ है कर्तव्य। श्रीमद […]
Read More