अर्थात जो कार्य सनातन धर्म सिद्धान्त के अनुरूप होते है, वह करने योग्य कार्य होते है। मनुष्य धर्म रूपी कार्यों को करने में ही मनुष्य का कल्याण है। अन्य शब्दों में कहा जाय तो, मनुष्य धर्म का पालन करने में ही मनुष्य का कल्याण है।
सृष्टि एक विशेष सिद्धान्त के कारण गतिशील है, जिसको यज्ञ सिद्धान्त कहा जाता है।
यज्ञ सिद्धान्त को विस्तार से जानने के लिये पढ़े >>>>
संक्षिप्त में वह इस प्रकार है।
आकाशगंगा, सौरमंडल, नक्षत्र, भूमण्डल, को मिला कर सृष्टि प्रतिष्ठित है। भूमण्डल मे भी वायु, अग्नि, जल, आकाश, पृथ्वी, जड़-चेतन प्राणी एवं अन्य अनेक प्रकार के प्रदार्थ है।
अगर सृष्टि एक इकाई है तो इस सृष्टि में जो भी प्रतिष्ठित है, वह इस इकाई के घटक है।
सृष्टि का चक्र रूप में गतिशील रहने का कारण यज्ञ सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त के अनुसार, सृष्टि का प्रत्येक घटक अपनी क्रिया से अन्य घटक को प्रभावित करता है और अन्य घटक के कार्य से स्वयं भी प्रभावित होता है। अपने गुणों के कारण और परस्पर प्रभावित होने के कारण सृष्टि के सभी घटक एक निश्चित प्रकार की क्रिया करते है, जिसके कारण सृष्टि गतिशील है।
अन्य घटको के समान मनुष्य से भी अपेक्षा की जाती है की वह भी सृष्टि चक्र के अनुरूप कार्य करे। क्योकि यज्ञ सिद्धान्त सन्तान धर्म सिद्धान्त श्रृंखला का भाग है, इसलिए यज्ञ सिद्धान्त का अनुसरण करना धर्म का पालन है – मनुष्य धर्म है।
सृष्टि के प्रत्येक घटक में होने वाली क्रिया (क्रिया-प्रतिक्रिया; उत्त्पति-उपस्थिति-विनाश) एक निश्चित रूप में होती है। घटक में होने वाली क्रियाओं का आधार, घटक को प्राप्त उसके गुण है। घटक के गुण, घटक में और घटक से होने वाली क्रिया-कार्य को नियमित करते है।
अतः सृष्टि के घटक में निश्चित रूप से होने वाली क्रिया/कार्य को उस घटक का गुण अथवा प्रकृति कहते है।
क्योकि प्रत्येक घटक का कार्य, सृष्टि को चक्र रूप में गतिशील रखने में सहायक होता है, इसलिये उस कार्य को घटक का ‘करने योग्य’ कार्य भी कहा जाता है। संस्कृत में इसको कर्तव्य कहते है।
घटकों के गुण सृष्टि के चक्र रूप में गतिशील रहने के लिये प्रतिष्ठित हुये है। और सृष्टि का चक्र रूप में गतिशील रहना धर्म सिद्धान्त का भाग है, इसलिये घटक के कर्तव्य (करने योग्य कार्य) को घटक का धर्म भी कहते है।
जल का धर्म बहना है, अग्नि का धर्म जलाना है, वृक्ष का धर्म फल-फूल देना है, आदि।
अन्य घटकों के समान मनुष्य को भी कुछ गुण प्राप्त है, जिनके प्रभाव में मनुष्य कार्य करता है। अतः गुणों के अनुरूप किये जाने वाले कार्य मनुष्य धर्म कहलाते है।
मनुष्य के गुण इस प्रकार है:
निर्णय लेने का कार्य बुद्धि और प्रज्ञा-विवेक का है और उस निर्णय लेने का आधार है, बुद्धि को प्राप्त ज्ञान।
मनुष्य के सभी निर्णय और कार्य संसार में रह कर, संसार के विषय को लेकर होते है। जिसमें वह स्वयं भी आ जाता है।
अतः निर्णय लेने से पूर्व मनुष्य के समक्ष, ज्ञान प्राप्ति के लिए दो मुख्य विषय है।
प्रथम – भौतिक विषय, जिसको लेकर निर्णय लेना है। जो निर्णय लेने का कारण है।
द्वितीय – अन्तःकरण की वृत्तियाँ एवं विषमतायें जो निर्णय को प्रभावित करती है।
प्राय: मनुष्य प्रथम विषय का ज्ञान तो प्राप्त करता है, परन्तु द्वितीय विषय से अनभिज्ञ रहता है।
मनुष्य की मूल प्रकृति है की उसके सभी निर्णय स्वयं के कल्याण के लिये हो । और इसके लिये वह प्रयत्न भी करता है। परन्तु अन्तःकरण की वृत्तियाँ अनजाने में, उसके इस प्रयत्न में व्यवधान डालती है। अतः यह आवश्यक है, कि मनुष्य अन्तःकरण की वृतियों के विषय में जाने और उनको किस प्रकार नियमित किया जाता है, उसका ज्ञान प्राप्त करे।
अन्तःकरण की वृत्तियाँ को जानना और नियमित कर भौतिक विषय पर कार्य का निर्णय लेने में योग सिद्धान्त सहायक है।
बुद्धि को (जो निर्णय लेने का कार्य करती है) सही ज्ञान हो और वह सही प्रकार से कार्य करे, यह आवश्यक है।
अतः जब मनुष्य सृष्टि के मूल सिद्धान्तों के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त कर, सिद्धान्तों के अनुरूप कार्य करने का निर्णय लेता है, और कार्य करता है, तब वह कार्य, “करने योग्य कार्य” कहलाते है। कर्तव्य कहलाते है। क्योंकि वह कार्य सनातन धर्म सिद्धान्त के अनुरूप होते है, इसलिये उन कर्तव्य को मनुष्य धर्म भी कहते है।
मनुष्य धर्म का पालन करने के लिये मनुष्य बाध्य नहीं है। क्योकि ऐसा होने से, जो गुण (प्रज्ञा-विवेक) निर्णय लेने की स्वतंत्रता प्रदान करता है, वह गुण निष्क्रिय हो जायेगा।
इसके लिये ही अध्याय २ श्लोक ४७ में भगवान श्री कृष्ण कहते है कि, कर्म करने अथवा न करने में मनुष्य स्वतंत्र है।
इसका दूसरा उदाहरण अर्जुन का है:
युद्ध न करने का निर्णय लेने पर, भगवान श्रीकृष्ण, अर्जुन को यह कह कर बाध्य नहीं करते कि “मैं कह रहा हूँ – तुम युद्ध करो”। वह उसके सम्मुख अनेक ज्ञान-विज्ञान के विषय प्रस्तुत करते है और उस प्रक्रिया में सम्पूर्ण श्रीमद् भगवद् गीता कही गई।
अतः मनुष्य के गुण (प्रज्ञा-विवेक) की गरिमा को ध्यान में रखते हुए, यह वांछनीय है कि मनुष्य अपने जीवन में पूर्ण ज्ञान प्राप्त करे और मनुष्य धर्म का पालन करे।
श्रीमद् भगवद् गीता के अध्याय ३ श्लोक १५ में भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि “कर्म (कर्तव्य) और उसकी विधि का ज्ञान वेदों से होता है”। अर्थात वेदों के ज्ञान से मनुष्य को कर्तव्य निर्धारित करने में मार्गदर्शन मिलता है।
मनुष्य अपने जीवन-निर्वाह के लिये जो कार्य करता है, वह मनुष्य का स्वधर्म है। अतः स्वधर्म मनुष्य का प्रथम कर्तव्य है।
स्वधर्म का पालन करते हुए मनुष्य को प्रकृति से जो प्राप्त होता है, उसको अन्यों के सेवा में लगा देना, पुनः मनुष्य धर्म है। इस विषय पर श्रीमद् भगवद् गीता में दो श्लोक कहे गए है।
अध्याय ३ श्लोक १२: प्रकृति से प्राप्त हुई सामग्री को दूसरों की सेवा में लगाये बिना जो मनुष्य स्वयं ही उसका उपभोग करता है, वह निश्चय ही चोर है।
अध्याय ३ श्लोक १३: जो लोग केवल स्वयं के लिये ही सब कर्म करते हैं, वे पापी लोग तो पाप का ही भक्षण करते हैं।
अतः मनुष्य का धर्म (कर्तव्य) है, पृथ्वी (पृथ्वी के समस्त जीव, जन्तु, वनस्पति, खनिज एवम अन्य पदार्थ) का संरक्षण, वृद्धि और कल्याण के लिये उनकी सेवा करना।
मनुष्य के द्वारा किये जाने वाले सेवा रूपी कर्तव्य – पृथ्वी, देश, समाज, परिवार को समर्पित होने चाहिये।
परन्तु जब मनुष्य को इस बात का विरोधाभास हो कि, प्राप्त परिस्थिति में उसका कर्तव्य किस के प्रति अधिक है, अथवा उसको किस को अधिक प्राथमिकता देनी है, तो उसका प्राथमिकता का क्रम इस प्रकार है।
स्वयं (शरीर) के प्रति जो कर्तव्य है वह शरीर के केवल निर्वाह मात्र का और स्वस्थ रखने का है।
मनुष्य का अधिक से अधिक भोग की वस्तु को प्राप्त करना और उसमें आसक्त रहना, मन की कामना पूर्ति करना, शरीर के प्रति कर्तव्य नही हैं। प्राय: मनुष्य भोग/ कामनाओं में इतना डूबा रहता है कि वह शरीर के स्वास्थ्य, मन की स्वच्छता और बुद्धि की स्थिरता का भी ध्यान नहीं करता।
अतः मनुष्य के सभी कार्य अन्यों के लिये है, स्वयं के लिये तो केवल निर्वाह मात्र का है।
व्यपकता से देखा जाय तो मनुष्य को, मनुष्य शरीर परमात्मा से प्राप्त हुआ है। मनुष्य का पालन-पोषण उसके माता-पिता द्वारा होता है। विध्या उसको गुरूजनों से मिलती है। संसार में वह जो भी कार्य करता है उसमें प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से समाज के अन्य लोगो का योगदान होता है। कार्य के लिये साधन सामग्री और कार्य का फल प्रकृति से प्राप्त होता है। इस प्रकार मनुष्य के पास जो कुछ भी सामग्री – बल, योग्यता, पद, अधिकार, धन, सम्पत्ति आदि है वह सब-की-सब दूसरों से ही मिली है।
इसलिये इनको दूसरों की ही सेवा में लगाना मनुष्य का परम कर्तव्य है। “मनुष्य धर्म है“।
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